हम कमजोर क्यों हैं ?
पिछले दिनों विश्व बैंक ने अपनी " अंतर्राष्ट्रीय करूबार रिपोर्ट २०१३" जारी की जिसमें कहा गया है कि भारत में कारोबारी गतिविधियों में कदम-कदम पर बाधाएं हैं। इसी रिपोर्ट में कारोबार के लिए अनुपयुक्त वातावरण वाले १८५ देशों में भारत को १३२ वां स्थान दिया गया है। भारत के बारे में ये आरोप तब और भी पुख्ता नज़र आते हैं जब हम यह देखते हैं कि एफडीआई के लिए भारत के बाज़ारों के दरवाजे खोल देने और विदेशी निवेशकों को विशेष रियायतें देने के बावजूद वे भारत में निवेश के प्रति उत्सुकता नहीं दिखा रहे हैं।
बात यहीं तक सीमित नहीं है , भारत के बड़े पूंजीपति और निवेशक अब निवेश के लिए दूसरे देशों का रुख कर रहे हैं। सरकार के विदेशी निवेशकों के सामने बार-बार झुकाने और अनुबंध की शर्तों में रियायतों के बावजूद यदि भारत में निवेश के प्रति उनका रुख सकारात्मक नहीं है तो क्या सरकार को कारोबारी कमियों को दूर करने का प्रयास नहीं करना चाहिए ? (१) पहले मालती ब्रांड रिटेल क्षेत्र में एफडीआई रिटेल स्टोर खोलने के लिए यह आवश्यक शर्त थी कि उस शहर की न्यूनतम जनसंख्या १० लाख से कम न हो , लेकिन सरकार ने अब वह शर्त हटा ली है। (२) पहले यह तय हुआ था कि विदेशी रिटेलर भारत के सूक्ष्म ,लघु और मझोले उद्यमों से ३० फीसदी की खरीददारी करेंगे और उन्हें अन्य सामानों के साथ अपनी रिटेल दुकानों में बिक्री के लिए रखेंगे, लेकिन अब उन्हें अपने पहले निवेश के दौरान ही ऐसा करना होगा और बाद में देशी सामानों को खरीदना या न खरीदना उनकी अपनी मर्जी पर निर्भर करेगा। (३) एफडीआई के लिए न्यूनतम निवेश की धनराशि १० करोड़ डालर में से आधी धनराशि निवेशकों को बुनियादी ढाँचे पर महज एक ही बार खर्च करनी होगी।
भारत पहला देश नहीं है जहां एफडीआई को अनुमति दी गयी हो। अनेकों देशों में पहले से ही एफडीआई लागू है लेकिन उन देशों ने अपनी सम्प्रभुता को निवेशकों के सामने गिरवी नहीं रखा। सवाल यह है कि हम ऐसा क्यों नहीं कर सके? हम सख्त क्यों नहीं हो सके? हम क्या सारी दुनिया जानती है कि इन दिनों भारत विश्व का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाज़ार है। किसी भी वैश्विक उत्पादक के लिए यह संभव ही नहीं है कि वह भारत के बाज़ार की अनदेखी कर सके। हम निवेशकों के सामने कड़ी शर्तें भी रखेंगे तो भी वे स्वीकार करेंगे, किन्तु आवश्यक यह है कि पहले हम कारोबारी गतिविधियों के मार्ग की बाधाएं दूर करें और व्यावसायिक विकास के लिए उपयुक्त वातावरण बनाने के लिए नीतियाँ बनाएं और उनका कार्यान्वयन भी हो।
दुनिया के कई देशों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश वएफडीआईहां की रिटेल बाज़ारों में वर्षों से हो रहा है, लेकिन उन देशों ने अपने बाज़ार और उपभोक्ता हितों को ध्यान में रखते हुए गुणवत्ता, विक्रय मूल्य, और अनुबंध में इतनी शर्तें पहले से ही लगा रखी हैं कि बड़े-बड़े अंतर्राष्ट्रीय निवेशक और कम्पनियां उन देशों के रिटेल बाज़ार को न तो चोट पहुंचा सकी हैं और न ही बाज़ारों पर आधिपत्य ही स्थापित कर सकी हैं। वे देश योजनाओं पर अमल बाद में करते हैं, पहले गुण-दोष, भावी परिणामों पर गहन विचार होता है और विपक्ष के तर्कों को भी महत्व दिया जाता है। यही वजह है कि विपरीत परिस्थितियों और संकट के दौर में सारा देश एकजुट हो जाता है।
भारत में ऐसा नहीं होता। यहाँ सरकार खुद को सर्वशक्तिमान समझती है। एफडीआई पर विपक्षी विरोध के बावजूद सरकार ने अपनी जिद रखी। अब किरकिरी हो रही है तो विपक्ष सहयोग क्यों करेगा। डालर के मुकाबले रुपया लगातार अवमूल्यन की ओर अग्रसर है। महगाई चरम पर और लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था के बावजूद सरकार ने खाद्य सुरक्षा बिल का चुनावी सोसा छोड़ दिया, बिना यह सोचे हुए कि इसके लागू न्होते ही देश पर पड़ने वाला एक लाख २५ हज़ार करोड़ का आर्थिक बोझ कहाँ से और किन मदों से पूरा किया जाएगा। एक और चालू वित्त वर्ष के घाटे को कम करने के लिए सोना गिरवी रखने की बातें और दूसरी ओर सरकार के सर पर सवा लाख करोड़ का एक और अतिरिक्त बोझ की योजना, है न शेखचिल्ली का सोच?
घरेलू बाज़ार की हवा निकल चुकी है, भारत का फुटकर व्यापार हिचकोले खा रहा है और ऊपर से एफडीआई के बैरियरों का खतरा। चीन निर्मित उत्पादों से पहले से ही पटे पड़े भारतीय बाज़ारों के कारण घरेलू उत्पादकों के सामने क्या कम समस्याएं थीं कि एफडीआई को विशेष रियायतें देकर सरकार ने घरेलू फुटकर बाज़ार की कमर पर एक और लात जड़ दी है ? माना कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भारत कोई नियंत्रण नहीं कर सकता लेकिन वह अपने घरेलू उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ाकर, उत्पादकों को प्रोत्साहित कर और बेवजह की अड़चने खादी करने वाली लालफीताशाही पर नियंत्रण कर घरेलू व्यवस्था को पटरी पर लाने का प्रयास तो किया ही जा सकता है।
कैसी विडम्बना है कि भारत अपनी मानव शक्ति का भी समुचित उपयोग नहीं कर पा रहा है। यहाँ की सरकारों की बागडोर संभालने वाले राजनैतिक तंत्र की नज़र में देश की मानव शक्ति महज वोट है और इस तंत्र की नज़र अगले चुनाव से आगे तक जा ही नहीं पाती, फिर क्या और किससे उम्मीद करे भारत ?
- एस एन शुक्ल
