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Sunday, 22 September 2013

हम कमजोर क्यों हैं ?

                                                       हम कमजोर क्यों हैं ?

    पिछले दिनों विश्व बैंक ने अपनी " अंतर्राष्ट्रीय करूबार रिपोर्ट २०१३" जारी की जिसमें कहा गया है  कि भारत में कारोबारी गतिविधियों में कदम-कदम पर बाधाएं हैं। इसी रिपोर्ट में कारोबार के लिए अनुपयुक्त वातावरण वाले १८५ देशों में भारत को १३२ वां स्थान दिया गया है।  भारत के बारे में ये आरोप तब और भी पुख्ता नज़र आते हैं जब हम यह देखते हैं कि एफडीआई के लिए भारत के बाज़ारों के दरवाजे खोल देने और विदेशी निवेशकों को विशेष रियायतें देने के बावजूद वे भारत में निवेश के प्रति उत्सुकता नहीं दिखा रहे हैं।
      बात यहीं तक सीमित नहीं है , भारत के बड़े पूंजीपति और निवेशक अब निवेश के लिए दूसरे देशों का रुख कर रहे हैं। सरकार के विदेशी निवेशकों के सामने बार-बार झुकाने और अनुबंध की शर्तों में  रियायतों के बावजूद यदि भारत में निवेश के प्रति उनका रुख सकारात्मक नहीं है तो क्या सरकार को कारोबारी कमियों को दूर करने का प्रयास नहीं करना चाहिए ? (१) पहले मालती ब्रांड रिटेल क्षेत्र में एफडीआई रिटेल स्टोर खोलने के लिए यह आवश्यक शर्त थी कि उस शहर की न्यूनतम जनसंख्या १० लाख से कम न हो , लेकिन सरकार ने अब वह शर्त हटा ली है। (२) पहले यह तय हुआ था कि विदेशी रिटेलर भारत के सूक्ष्म ,लघु और मझोले उद्यमों से ३० फीसदी की खरीददारी करेंगे और उन्हें अन्य सामानों के साथ अपनी रिटेल दुकानों में बिक्री के लिए रखेंगे, लेकिन अब उन्हें अपने पहले निवेश के दौरान ही ऐसा करना होगा और बाद में देशी सामानों को खरीदना या न खरीदना उनकी अपनी मर्जी पर निर्भर करेगा। (३) एफडीआई के लिए न्यूनतम निवेश की धनराशि १० करोड़ डालर में से आधी धनराशि निवेशकों को बुनियादी ढाँचे पर महज एक ही बार खर्च करनी होगी। 
    भारत पहला देश नहीं है जहां  एफडीआई को अनुमति दी गयी हो।  अनेकों देशों में पहले से ही एफडीआई लागू है लेकिन उन देशों ने अपनी सम्प्रभुता को निवेशकों के सामने गिरवी नहीं रखा। सवाल यह है कि हम ऐसा क्यों नहीं कर सके? हम सख्त क्यों नहीं हो सके? हम क्या सारी दुनिया जानती है कि इन दिनों भारत विश्व का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाज़ार है।  किसी भी वैश्विक उत्पादक के लिए यह संभव ही नहीं है कि वह भारत के बाज़ार की अनदेखी कर सके। हम निवेशकों के सामने कड़ी शर्तें भी रखेंगे तो भी वे स्वीकार करेंगे, किन्तु आवश्यक यह है कि पहले हम कारोबारी गतिविधियों के मार्ग की बाधाएं दूर करें और व्यावसायिक विकास के लिए उपयुक्त वातावरण बनाने के लिए नीतियाँ बनाएं और उनका कार्यान्वयन भी हो। 
    दुनिया के कई देशों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश वएफडीआईहां की रिटेल बाज़ारों में वर्षों से हो रहा है, लेकिन उन देशों ने अपने बाज़ार और उपभोक्ता हितों को ध्यान में रखते हुए गुणवत्ता, विक्रय मूल्य, और अनुबंध में इतनी शर्तें पहले से ही लगा रखी हैं कि बड़े-बड़े अंतर्राष्ट्रीय निवेशक और कम्पनियां उन देशों के रिटेल बाज़ार को न तो चोट पहुंचा सकी हैं और न ही बाज़ारों पर आधिपत्य ही स्थापित कर सकी हैं। वे देश योजनाओं पर अमल बाद में करते हैं, पहले गुण-दोष, भावी परिणामों पर गहन विचार होता है और विपक्ष के तर्कों को भी महत्व दिया जाता है। यही वजह है कि विपरीत परिस्थितियों और संकट के दौर में सारा देश एकजुट हो जाता है। 
   भारत में ऐसा नहीं होता। यहाँ सरकार खुद को सर्वशक्तिमान समझती है। एफडीआई पर विपक्षी विरोध के बावजूद सरकार ने अपनी जिद रखी।  अब किरकिरी हो रही है तो विपक्ष सहयोग क्यों करेगा। डालर के मुकाबले रुपया लगातार अवमूल्यन की ओर अग्रसर है।  महगाई चरम पर और लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था के बावजूद सरकार ने खाद्य सुरक्षा बिल का चुनावी सोसा छोड़ दिया, बिना यह सोचे हुए कि इसके लागू न्होते ही देश पर पड़ने वाला एक लाख २५ हज़ार करोड़ का आर्थिक बोझ कहाँ से और किन मदों से पूरा किया जाएगा।  एक और चालू वित्त वर्ष के घाटे को कम करने के लिए सोना गिरवी रखने की बातें और दूसरी ओर सरकार के सर पर सवा लाख करोड़ का एक और अतिरिक्त बोझ की योजना, है न शेखचिल्ली का सोच?
       घरेलू बाज़ार की हवा निकल चुकी है, भारत का फुटकर व्यापार हिचकोले खा रहा है और ऊपर से  एफडीआई के बैरियरों का खतरा। चीन निर्मित उत्पादों से पहले से ही पटे  पड़े भारतीय बाज़ारों के कारण घरेलू उत्पादकों के सामने क्या कम समस्याएं थीं कि एफडीआई को विशेष रियायतें देकर सरकार ने घरेलू फुटकर बाज़ार की कमर पर एक और लात जड़ दी है ? माना  कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भारत कोई नियंत्रण नहीं कर सकता लेकिन वह अपने घरेलू उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ाकर, उत्पादकों को प्रोत्साहित कर और बेवजह की अड़चने खादी करने वाली लालफीताशाही पर नियंत्रण कर घरेलू व्यवस्था को पटरी पर लाने का प्रयास तो किया ही जा सकता है। 
   कैसी विडम्बना है कि भारत अपनी मानव शक्ति का भी समुचित उपयोग नहीं कर पा रहा है।  यहाँ की सरकारों की बागडोर संभालने वाले राजनैतिक तंत्र की नज़र में देश की मानव शक्ति महज वोट है और इस तंत्र की नज़र अगले चुनाव से आगे तक जा ही नहीं पाती, फिर क्या और किससे उम्मीद करे भारत ?
                                          
                                                                         - एस एन  शुक्ल  

कांग्रेस के मिस्त्री

uttar pradesh

                         कांग्रेस के  मिस्त्री

  उत्तर  प्रदेश में कांग्रेस की ढहती इमारत को बचाने पहले मध्य प्रदेश के  पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अर्थात दिग्गी राजा को भेजा गया था . वह राहुल   गांधी के अघोषित गुरू चाणक्य भी कहे जाते थे . अभद्र और ज़बानदराज , जिन्होंने अपनी ज़बान की खुजली के कारण कांग्रेस को कोई मदद तो नहीं की , अलबत्ता 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को उतनी सीटें भी नहीं जितवा सके जितनी सीटें उसने 2009 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश से जीतीं थीं . शायद तभी कांग्रेस नेतृत्व को एहसास हुआ कि दिग्गी डैमेज कंट्रोल के बजाय और भी डैमेज कर रहे  हैं . कांग्रेस को यह देर से समझ आया कि ढहती इमारत की मरम्मत का काम तो मिस्त्री का है, उसे राजा कैसे कर  सकता है , इसीलिये उत्तर प्रदेश वाया गुजरात  मधुसूदन मिस्त्री को लाया गया है . 
     भाजपा ने उत्तर प्रदेश का पार्टी  प्रभारी अमित शाह को  बनाया अर्थात मोदी के करीबी ,विश्वस्त ,चर्चित और प्रखर हिंदुत्व का प्रतीक चेहरा तो कांग्रेस अमित शाह के जवाब के तौर पर मधुसूदन मिस्त्री को ले आयी . मिस्त्री भी कभी संघ के खाकी नेकर वाले कैडर कार्यकर्ता थे और भाजपा के पूर्व बागी शंकर सिंह बाघेला के बेहद करीबी तथा विश्वस्त . इस नाम  को आम लोगों ने सुना तभी जब वह कांग्रेस के यू पी प्रभारी बनाकर भेजे गए  और यह प्रचारित किया गया कि मिस्त्री भी गुजरात से हैं और मोदी के  धुर विरोधियों में से एक हैं . इसमें कोई दो राय नहीं कि मिस्त्री उत्तर प्रदेश में लगातार सक्रिय हैं, आम कार्यकर्ताओं से मिलकर जमीनी हकीकत से रूबरू होने की पूरी कोशिश कर रहे हैं . भावी चुनाव में जीत हासिल करने के टिप्स दे रहे हैं . मठाधीश कांग्रेसियों  में से कौन क्या कर रहा है इस बारे में आलाकमान को रिपोर्ट कर रहे हैं तो कांग्रेस के वर्त्तमान सांसदों में से कौन अपने निर्वाचन क्षेत्र में लोकप्रिय है और किसका ग्राफ गिर रहा है , इससे भी पार्टी नेतृत्व को अवगत करा रहे हैं .
       इतना सब होने के बावजूद मिस्त्री कांग्रेस की ढहती इमारत की मरम्मत कर उस पर नया रंग रोगन कर चमका पायेंगे इसे लेकर खुद उनकी ही पार्टी के क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं में संदेह है. वजह यह कि कांग्रेस के बहुत सारे पूर्व नेताओं ने इन दिनों दूसरे दलों का दामन थाम रखा है तो जो पुराने कांग्रेसी हैं उनके और नयी पीढ़ी के बीच सामंजस्य नहीं बैठ पा रहा है . कांग्रेस के पास इस समय उत्तर प्रदेश में कार्यकर्ताओं से ज्यादा नेताओं और पदाधिकारियों की फ़ौज है जो सुविधाभोगी राजनीति के आदी हो चुके हैं . टिकट की प्रत्याशा में वे राज्य क्या राष्ट्रीय स्तर के नेताओं की गणेश परिक्रमा कर सकते हैं लेकिन जनता के बीच जाने और उसका दुःख -दर्द जानने की उन्हें फुर्सत कहाँ है. जनता भी उन्हें नहीं पहचानती . बीते लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का राज्य में 22 लोकसभा सीटें जीतना कांग्रेस की लोकप्रियता या उसके नेताओं का करिश्मा नहीं था . यह बढ़त उसे मुस्लिम मतदाताओं के कांग्रेस की ओर झुकाव के कारण उसे मिली थी .  वर्ष 2012 के राज्य विधानसभा चुनाव में वह जादू नहीं चल  सका क्योंकि तब तक मुलायम की समाजवादी पार्टी अपना डैमेज कंट्रोल कर चुकी थी और कांग्रेस की ओर कदम बढ़ा चुके मुस्लिम मतदाताओं ने फिर सपा की और अपने कदम वापस ले लिए थे . 
                                        

Saturday, 21 September 2013

संत , स्वामी और बाबा

                                            संत , स्वामी और बाबा

    संत कवि  तुलसीदास ने साढ़े चार सौ वर्ष पहले अपनी कृति रामचरित मानस में कहा था " तपसी धनवंत दरिद्र गृही , कलि कौतुक तात न जात कही " यद्यपि तब तपस्वी और संत मोहमाया मुक्त हुआ करते थे , लेकिन तुलसीदास भविष्य दृष्टा थे और उन्होंने जो अब से साढ़े चार सौ वर्ष पहले लिख दिया वह आज प्रत्यक्ष में दिख रहा है। पहले धार्मिक स्थानों और तीर्थस्थलों पर राजाओं तथा सेठों की बनवाई धर्मशालाएं होती थीं , जहां श्रृद्धालुओं के अतिरिक्त साधु - संत भी आकर आश्रय लेते थे और फिर अपने गंतव्य की ओर चल देते थे। साधुओं को धन जुटाने की आवश्यकता तब इसलिए भी नहीं थी क्योंकि उनके खर्चे सीमित थे , उनके भोजन की चिंता समाज करता था, वस्त्रादि भी  श्रृद्धालु दान में देते ही थे। जंगल में कुटिया , ईश आराधना, गोसेवा और समाज को सन्मार्ग पर चलने की सतत प्रेरणा। यही था उनका जीवन। तभी वे आज भी मानव स्मृतियों में जीवित हैं और उनकी कथाएं ग्रंथों में। वैदिक कालीन संतों महर्षि भारद्वाज, याज्ञवल्क,यमदग्नि,से महर्षि दधीचि और फिर मध्यकाल के संतों सूर, कबीर, तुलसी, तिरुवल्लुवर, तुकाराम और रविदास तक या फिर महर्षि दयानंद, स्वामी विवेकानंद में से किसको धन की आवश्यकता थी। 
       आज समय बदल गया है।  सच्चे संतों की जगह तिकड़मी, अपराधी और व्यापारी संत के वेश में आष्टा का दोहन कर रहे हैं। अब धार्मिक स्थलों और तीर्थों पर इन्हीं कथित स्वामियों की पंचसितारा होटल की सुविधाओं वाली धर्मशालाएं हैं, जहां सबकुछ उपलब्ध है, जिसकी आप किसी पंचसितारा होटल में अपेक्षा कर सकते हैं। साफ़ शब्दों में कहें तो शराब और शबाब भी।  यही वजह है कि नव धनाड्यों और सेठों- साहूकारों को कथित संतों की ये धर्मशालाएं लुभाती हैं। जहां वे पैसा खर्च करते हैं, ऐयाशियां करते हैं और उनकी करतूतें समाज में सार्वजनिक भी नहीं होनें पातीं।  आज का राजनैतिक चरित्र भी किसी से छिपा नहीं है। ऐसे ढोंगी बाबाओं के सबसे बड़े ग्राहक तो वे ही हैं और किसी अप्रत्याशित स्थिति में पुलिस तथा कानून से बचाने में वे ही उनके मददगार भी बनाते हैं।     
      जब राजनेता ऐसे बाबाओं का चरण वंदन करने लगते हैं तो स्वाभाविक तौर पर उनकी महत्वाकांक्षाएं भी हिलोरें लेने लगती हैं।  वे भी सत्ता का सुख भोगने को लालायित हो उठते हैं।  यही वजह है कि कभी बाबा जय गुरुदेव ने दूरदर्शी पार्टी बनायी थी, बाबा रामदेव ने स्वाभिमान ट्रस्ट के माध्यम से चुनाव मैदान में प्रत्याशी उतारने की योजना बनायी थी और आचार्य श्रीराम शर्मा के उत्तराधिकारी तथा शांतिकुंज हरिद्वार के सर्वेसर्वा प्रणव पांड्या ऐसी योजना बनाते-बनाते रह गए। यद्यपि कुछ बाबाओं ने संपत्ति भी जुटाई  और समाज के लिए कुछ कर भी रहे हैं , लेकिन जो कथित संत प्रवचन देने के लिए अपने समय या घंटों के हिसाब से मेहनताना मागते हैं, आश्रमों   में शुद्ध व्यावसायिक गतिविधियाँ चला रहे हैं, लोगों की भीड़ जुटाकर गरीबों की सम्पत्तियों पर कब्जा कर रहे हैं या सरकारी जमीनों पर जबरन काबिज हो रहे हैं, उन्हें संत कैसे माना जा सकता है ?
        जिस देश की ४० फीसदी जनसंख्या कुपोषण की मार झेल रही हो, वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार विश्व के कुल कुपोषित बच्चों में से यदि हर तीसरा बच्चा भारत का हो और उसी भारत में यदि ढोंगी बाबाओं पर हर रोज लाखों रुपया लुटाया जा रहा हो।  वे चांदी के सिंहासन पर बैठकर और सोने का मुकुट पहनकर अपनी पूजा करा रहे हों और जनता  अंधश्रद्धा में उन्हें भगवान मानकर उनकी पूजा कर रही हो, तो ऐसे देश का भविष्य तो स्वयं ही सवालों के घेरे में खड़ा नजर आता है।  सरकार इनके अवैध रूप से कब्जा कर बनाए गए आश्रमों, जिनमें प्रायः मंदिर खड़े कर दिए जाते हैं, को छेड़ने  का साहस नहीं जुटा सकती क्योंकि तब वह धर्मविरोधी ठहरा दी जायेगी और अंध विश्वाशी , श्रद्धालु सरकार के खिलाफ सडकों पर उतर आयेंगे। 
       ऐसी धर्म  की दुकानें केवल हिन्दू धर्म के बाबाओं की ही नहीं हैं।  राष्ट्रीय और राजकीय मार्गों का हिस्सा घेरकर बनायी गयी मस्जिदें, सड़क यातायात में बाधक देश भर में फ़ैली हजारों की संख्या में  मजारें, जहां ख़ास दिनों में भीड़ बढ़ जाती है, जहां उर्स होते हैं, मेले लगते हैं और पुलिस भीड़ को नियंत्रित करने में हलकान रहती है। 
      कोई अनहोनी, कोई हादसा हो जाय तो सरकार की भड़ास भी ड्यूटी पर तैनात पुलिस और अधिकारियों के निलंबन पर ही निकलती है। पुलिस ऐसे बाबाओं और स्वामियों में श्रद्धा रखने वाली भीड़ और उनके राजनैतिक रसूखों के आगे बेबस हो जाती है। आशाराम भी ऐसे ही अंध श्रद्धालुओं द्वारा पूजा जानेवाला कथित बाबा है।  वह संत की नहीं ऐश्वर्यपूर्ण राजशी जिन्दगी जीता रहा है। इस समय वह भले ही अपने ही आश्रम द्वारा संचालित स्कूल में शिक्षा पा रही एक अवयस्क बालिका के यौन शोषण के आरोप में जेल में है लेकिन उसके पास अपार पैसा है , वह नामी वकील खड़े कर और गवाहों को खरीद कर आरोपों से मुक्त हो सकता है , लेकिन क्या इससे वह पाक दामन हो जाएगा ?
      कहावत हीब कि " बकरी पत्ता खाति है, तिसै सतावै काम / जे नित रबड़ी खाति हैं , तिनको कौन कयाम। यह कहावत आशाराम पर अक्षरशः चरितार्थ होती है। वह जेल में भी महिला वैद्य से उपचार की मांग करता है , क्या इसके बाद भी आशाराम की बलवती कामवासना पर संदेह रह जाता है ? राम जेठमलानी को उसने वकील नियुक्त किया है।  संभव है कि जेठमलानी अपने तर्कों के बल पर आशाराम को सजा से बचाने में कामयाब भी हो जाएँ लेकिन क्या इससे उसके पाप भी धुल जायेंगे ? सवाल जनता के जागने का है , उसके जागरुक बनाने का है लेकिन क्या भारत में ऐसा संभव है जहां लोग बस भेड़ों की तरह पीछे चलना भर जानते हैं ?

Tuesday, 16 July 2013

जम्मू-कश्मीर और धारा-3 7 0

                   जम्मू-कश्मीर और धारा-3 7 0

   भारतीय जनता पार्टी की और से यदा-कदा जम्मू-कश्मीर में धारा 3 7 0 समाप्त किये जाने की मांग उठायी जाती रहती है। हाल ही में भाजपा नेता और पार्टी की ओर से भावी प्रधानमंत्री पद के अघोषित उम्मीदवार , गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फिर जम्मू-कश्मीर से धारा 3 7 0 हटाने की बात कहकर राज्य की सियासत में हलचल पैदा कर दी। बुधवार 2 6 जून को जम्मू और कश्मीर को जोड़ने वाली काजीगुंड-बनिहाल रेल ट्रैक के उदघाटन अवसर पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूं पी ए अध्यक्ष सोनिया गांधी की उपस्थिति में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उम्र अब्दुल्ला ने कहा कि राज्य में संविधान की धारा 3 7 0 को समाप्त करने के लिए मेरी लाश पर से गुजरना होगा।
      पिछले दिनों जब उत्तर प्रदेश के काबीना मंत्री मो० आज़म खान ने कहा था कि जम्मू-कश्मीर , भारत का हिस्सा नहीं है तो लोग उनकी आलोचना करने ही नहीं, उन्हें देशद्रोही तक करार देने पर आमादा हो गए थे। लेकिन आज़म खान ने तो सच्चाई को ही आइना दिखाया था। आखिर क्यों नहीं खरीद सकता कोई भारतीय जम्मू-कश्मीर में अचल सम्पत्ति और वहाँ के निवासियों को भारत के किसी भी हिस्से में चल-अचल संपत्ति खरीदने, बनाने का अधिकार क्यों है?
      भारत के संविधान के अनुसार देश के नागरिकों को देश भर में कहीं भी बसने, जमीन-जायदाद खरीदने का अधिकार प्राप्त है, सिवाय जम्मू-कश्मीर के।यदि भारत के लोगों को जम्मू-कश्मीर में  यह अधिकार प्राप्त नहीं है तो जम्मू-कश्मीर  को भारत का अभिन्न अंग कहने और उस राज्य पर भारत का आधिपत्य का दावा क्या खोखला नहीं है ? उमर  अब्दुल्ला जैसे लोग यदि नहीं चाहते कि भारत जम्मू-कश्मीर में अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग देश के अन्य राज्यों की तरह ही करे तो फिर उन्होंने किस अधिकार से केंद्रीय मंत्रिमंडल में भागीदारी निभाई थी और किस अधिकार से इस समय उनके पिटा फारुख अब्दुल्ला केंद्र सरकार का हिस्सा बने हुए हैं ?
     उल्लेखनीय है कि धारा ३ ७ ० ही जम्मू-कश्मीर के लोगों को यह एहसास कराती रहती है कि वे भारत से अलग हैं , उनका भारत से प्रथक अस्तित्व है , और यही एहसास अलगाववाद को जन्म देता है/ जब देश का संविधान जम्मू-कश्मीर के लोगों पर लागू ही नहीं होता तो वे भारत के प्रति निष्ठा और हमदर्दी रखें भी तो क्यों ?आज जम्मू -कश्मीर में कश्मीरी पंडितों का वहां के अलगाववादियों ने जीना मुहाल कर रखा है / अपनी इज्जत बचाकर बहुत से कश्मीरी पंडित राज्य से पलायन कर गए / उनके घरों और जायदाद पर वही अलगाववादी कुण्डली मारे बैठे हैं/ हज़ारों कश्मीरी पंडित अभी भी शरणार्थी के रूप में दिल्ली में ही जिन्दगी बशर कर रहे हैं / मीडिया उनकी व्यथा को प्रायः सार्वजनिक भी करता है , लेकिन संवेदनहीन राजनैतिक तंत्र पर उसका असर नहीं होता /
   यदि जम्मू-कश्मीर में धारा ३ ७ ० लागू न होती  और वहां भारतीय संविधान पूरी तरह प्रभावी होता तो शायद कश्मीरी पंडितों पर ज्यादतियां करने का साहस अलगाववादी ताकतें नहीं कर पातीं, और अगर करतीं भी तो उनको मुहतोड़ जवाब भी दिया जा सकता था / यदि जम्मू-कश्मीर में किसी भी भारतीय नागरिक को स्थायी संपत्ति बनाने का अधिकार होता तो वहां देश के कारपोरेट घराने पूंजी लगा सकते थे , नए उद्दयम स्थापित कर सकते थे / इससे वहां के बेकार नौजवानों के हाथों को काम मिलता, बेकारी कम होती और राज्य का आर्थिक विकास भी होता / सबसे बड़ा लाभ यह होता कि जब बेकार युवा हाथों में काम होता तो प्रथाकतावादी ताकतों की शक्ति खुद ही घाट जाती /
      आज जम्मू-कश्मीर में सक्रीय दो बड़ी सियासी पार्टियों नेशनल कांफ्रेंस और पी डी पी के अलगाववादी ताकतों से रिश्ते जगजाहिर हैं जो कश्मीर घाटी की शान्ति स्थापना में सबसे बड़ी बाधा है/ यदि धारा ३ ७ ० की बाधा न होती तो कश्मीर घाटी में देश के अन्य भागों के लोग जमीनें खरीदते, पर्यटक और विश्राम गृह बनवाते , खुद वहां बसते और उस सूरत में कश्मी में उस सम्प्रदाय का एकाधिकार समाप्त हो जाता जो वहां विसंगतियों को फैलाने के लिए जिम्मेदार है / यह सब तभी संभव है जब केंद्र में दृढ इक्षाशक्ति वाली सरकार हो और राज्य सरकार की नाराजगी की परवाह किये बिना धारा ३ ७ ० समाप्त कर आम भारतीय को घाटी में भी वही अधिकार प्रदान करे जो देश के अन्य राज्यों में प्राप्त हैं / मौकापरस्तों और देश के स्वार्थी तत्वों ने पृथ्वी के स्वर्ग को नर्क बनाकर रख दिया है , क्या कश्मीर कभी मुक्त हो पायेगा इन राक्षसी पंजों से ?
                                                                           - एस .एन .शुक्ल 

Wednesday, 20 February 2013

प्रिय महोदय/महोदया,

जर्नलिस्ट्स, मीडिया एण्ड रायटर्स वेलफेयर एसोसिएशन द्वारा पूर्व में प्रकाशित स्मारिका "श्रम साधना" की अपार लोकप्रियता के बाद हम "स्वाधीनता के 65 वर्ष और भारतीय संसद के 6 दशक" की गति-प्रगति, उत्कर्ष-पराभव, गुण-दोष, लाभ-हानि, समस्याओं तथा सुधारात्मक उपायों  पर आधारित सम्पूर्ण  विवेचन-विश्लेषण को

                    "समसामयिक दस्तावेज़"

के रूप में प्रकाशित करने जा रहे हैं। प्रष्ठों  की संख्या 1000 से भी अधिक होने की संभावना  है और आकार ए-4 साइज (11गुणे 8 इंच)

                 "समसामयिक दस्तावेज़" में समाहित विषय सामग्री :-

 प्रथम खण्ड  

.भारत एक दृष्टि में,महत्वपूर्ण तथ्य, भारत का राजनैतिक स्वरूप, जनगणना के आंकड़े, राज्य, कृषि , खनिज, उद्यम , परिवहन, प्राचीन इतिहास, प्राचीन भारत, मध्यकालीन भारत, युरॊपियों  का भारत में प्रवेश और आधिपत्य स्थापन, 

द्वितीय खण्ड 

विद्रोह और उनके नायक, प्रमुख धार्मिक, सामाजिक और जनजातीय आन्दोलन, स्वाधीनता आन्दोलन, मुक्ति संघर्ष की प्रमुख घटनाएँ, राष्ट्र विभाजन की पीड़ा, लोकतंत्र की स्थापना, गांधीजी की हत्या, गणतंत्र बना भारत, अपना संविधान, भारत के राष्ट्रपति , प्रधानमंत्री, उप प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष, लोकसभा अध्यक्ष, मुख्या न्याधीश और उनके कार्यकाल।

 तृतीय खंड 

.जिनके कुशल नेतृत्व में की ओर बढ़ा भारत, समाजसेवा और सामाजिक चेतना के नायक, ज्ञान के वाहक, दुश्मनों के बार-बार के आक्रमण, अन्न संकट का दौर, पाकिस्तान का विभाजन और बंगलादेश का उदय, जनरल मानेक शा , जब इंदिरा गांधी दुर्गा का प्रतिमान बनीं, संजय गांधी का राजनैतिक क्षितिज पर उदय, अलगाववादी आन्दोलन,जयप्रकाश आन्दोलन, आपातकाल , केंद्र में प्रथम गैर कांग्रेसी  सरकार, जनता पार्टी का बिखराव, केंद्र में पुनः कांग्रेस  की वापसी, खालसा  आंदोलन और आपरेशन ब्लू स्टार, इंदिराजी की ह्त्या और सिख विरोधी दंगे, युवा प्रधानमंत्री राजिव,लिट्टे और उसका तांडव, दलित चेतना के महानायक कांशीराम, किसानों के अगुआ  महेंद्र सिंह टिकैत,वी पी सिंह का कार्यकाल,

चतुर्थ खण्ड 

 राम मंदिर आन्दोलन की उग्रता, साम्प्रदायिक तनाव का दौर, बाबरी ध्वंश और उसके बाद की राष्ट्रीय पीड़ा, पी वी नरसिंह राव, निर्वाचन आयोग की सक्रियता, गोधरा और गुजरात दंगें, आतंकी घटनाओं से जूझता देश, सियासत का चारित्रिक पतन, धरमनिर्पेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता, सामाजिक सरोकारों के योद्धा राजनीति में क्षत्रपों का उदय, विदेशी बैंकों में जमा स्वदेशी कालाधन, पॊञ्जिवादिओन के गुलाम मीडिया समूह, चारण और भाटों की भूमिका में कारपोरेट मीडिया, जनाक्रोश, न्याय व्यवस्था की दुरिह्ताएं, अव्यवस्थित पंचायतीराज व्यवस्था, सता और पूंजी का घालमेल, क्षेत्रीयता की संकुचित राजनीति , नापाक सियासी गठजोड़, स्वाधीन भारत कीमहत्वपूर्ण  उपलब्धियां,जिन्होंने फहराई भारत की यश पताका , उम्मीद भरे नेतृत्वकर्ता।

पांचवां खण्ड 

.ज्वलंत मुद्दे :-मूल अधिकारों से वंचित आम आदमी, साम्प्रदायिकता और जातीयता, अनवरत भ्रष्टाचार, वैश्विक बिरादरी में भारत की गिरती साख, दोषपूर्ण  न्याय व्यवस्था, राजनीति का अपराधीकरण , कुनबों की गिरफ्त में सियासत, लोकतंत्र बनाम लूटतंत्र, योजनागत लाभों का असंगत वितरण, असमान  और महंगी शिक्षा, प्रतिभा और योग्यता की उपेक्षा, अमानवीय पुलिसतंत्र, असहाय न्याय व्यवस्था, आरक्षण की दोषपूर्ण व्यवस्था, नैतिकता ताख पर, उपेक्षित अन्नदाता, अपसंस्कृति  के मकड़जाल में युवा, शिक्षित बेरोजगारों की बढ़ती  जमात, सेवक नहीं शासक की भूमिका में नौकरशाही, घटती बेटियाँ, उपेक्षित आधी आबादी, उच्च और तकनीकी शिक्षा का व्यवसायीकरण, उपेक्षित  गाँव, असंवैधानिक जनप्रतिनिधित्व, अपात्रों के हवाले योजनाओं का लाभ, शिक्षा के मंदिरों में सियासी अखाड़े,

और साथ में

छठा खण्ड 

 अन्य वह विषय सामग्री जिसकी कि इस प्रकार के दस्तावेज़ में अपेक्षा की जा सकती है तथा देश के विद्वान  लेखकों के आलेख, रचनाएं, विचार, और सुधारात्मक उपाय


हम आपसे  सहयोग, समर्थन, शुभकामनाओं और उत्साहवर्धन की अपेक्षा करते हैं। जल्द ही 'समसामयिक दस्तावेज़ ' नियमित साप्ताहिक के रूप में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराएगा ।


आप अपने  आलेख  journalistsindia@gmail.com, jmwa@in.com पर प्रेषित करें।

विस्तृत या अन्य किसी प्रकार प्रकार की जानकारी के सम्बन्ध में संपर्क करें ;-

 एस .एन .शुक्ल , +919455038215

Sunday, 27 January 2013

विस्थापन, अर्थात अपने ही देश में शरणार्थी

       स्वाधीनता के पैंसठ वर्ष और इन पैंसठ वर्षों में देश के छः करोड़ 50 लाख से भी अधिक लोग विकास के नाम पर अपने ही देश में बेघर कर दिए गए। औसत प्रति वर्ष 10 लाख से भी अधिक लोगों के आशियाने उजाड़े गए और उन्हें फिर से बसाने की चिंता देश की किसी भी सरकार ने नहीं की। यह आरोप नहीं सच्चाई है जिसे पिछले दिनों ही डब्लू जी एच आर की रिपोर्ट में स्वीकार किया गया है। ऐसी ही अनेक योजनाओं से धनपति और उद्यमी तो मालामाल हुए लेकिन वहां के बाशिंदे बेघर  और कंगाल। वे गरीब वर्षों से न्याय की उम्मीद में भटक रहे हैं, क्या कभी पोछे जा सकेंगे उनके आँसू  ?

        वह भाखड़ा  नांगल बाँध , जिसके निर्माण पर इस देश ने अपने हाथों अपनी पीठ थपथपाई थी, लेकिन देश की यह बड़ी उपलब्धि सबसे अधिक महगी देश के उन 2180 परिवारों को साबित हुयी, जिनके आशियानों और रोटी देने वाले खेतों को इस विशाल बाँध ने निगल लिया।वर्ष 1963 में उजाड़े गए इन परिवारों में से  पच्चीस वर्ष बाद  1988 में महज 730 परिवारों को ही पुनः बसाया जा सका, शेष 1450 परिवार कहाँ गए, क्या कर रहे हैं और हैं भी या नहीं , इसे जानने की जरूरत इस देश की व्यवस्था ने आज तक नहीं महसूस की।
       केवल भाखड़ा ही नहीं, देश के अन्य बांधों के निर्माण  में भी अब तक 1 करोड़ 64 लाख लोग विस्थापित किये गए तो खनन के कारण 25 लाख 50 हजार,उद्यमों की स्थापना में 12 लाख 50 हजार तथा अन्य विकास परियोजनाओं के कारण 11 लाख से अधिक लोग बेघर कर दिए गए। यह 1950 के बाद से लेकर अब तक का अधिकृत आंकड़ा है, जबकि वास्तविक सँख्या कहीं इससे भी अधिक हो सकती है। विस्थापितों की इस संख्या में वे लोग शामिल नहीं हैं जो वर्षों से उन अधिगृहीत की गयी जमीनों पर खेती- बारी तो कर रहे थे लेकिन उनके पास उन जमीनों से सम्बंधित ऐसे कोई अभिलेख नहीं थे जिससे वे खुद को उन जमीनों का मालिक साबित कर सकें। वर्किंग ग्रुप आन ह्यूमन राइट्स इन इंडिया ( w g h r ) की गत वर्ष प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार देश की स्वाधीनता के बाद से अब तक देश के लगभग साधे छः करोड़ लोगों को विकास परियोजनाओं के चलते विस्थापन का दंश झेलना पड़ा।
       उल्लेखनीय है कि पूरी दुनिया में शरणार्थियों की संख्या 1.5 करोड़ से 1.6 करोड़ के बीच है तो अकेले भारत में विकास के नाम पर साधे छः करोड़ लोग बेघर कर दिए गए, अर्थात अपने ही देश में शरणार्थियों से भी बदतर  बना दिए गए , क्या यह स्थिति दुखद एवं भयावह नहीं है ? बांधों और जलाशयों के अधिकाँश निर्माण उन क्षेत्रों में ही किये गए जहां बहुतायत संख्या में आदिवासी परिवार रहते थे। प्रस्तुत 17 बड़े बांधों के निर्माण में कुल 9, 07, 874 लोग विस्थापित हुए तो  से 5, 48, 426 लोग अर्थात 60.41 फीसदी लोग जनजातीय परिवारों के थे।आदिवासी प्रायः अशिक्षित होते हैं। उन्हें अपने अधिकारों और क़ानून के बारे में जानकारी नहीं होती। उनके लिए तो पुलिस ही अदालत है और पुलिस ही क़ानून।जब ठेकेदारों और अधिकारियों से उपकृत होकर पुलिस  को धमकाती है तो वे प्रतिरोध नहीं कर पाते और बिना विस्थापन के मुआवजे की प्रतीक्षा किये ही रोजी-रोटी की तलाश में बड़े शहरों की ओर निकल जाते हैं।
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बड़े बांधों ने सबसे अधिक आदिवासी उजाड़े 

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क्रम  परियोजना          राज्य       विस्थापितों की         आदिवासी 
                                                      कुल संख्या    
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  सरदार सरोवर      गुजरात        2,00000        1,15,200
  पोलावरम           आन्ध्र प्रदेश    1,50000           79,350
  मेथान /पांचेत      बिहार              93,874            53,001
  पोंग                   हिमाचल प्रदेश   80,000            45,000
  कोयल कारो         बिहार              66,000            58,080
 उकई जलाशय        गुजरात          52,000              9,838
 माही बजाज सागर राजस्थान       38,400             29,292
 इवमपल्ली           आन्ध्र प्रदेश      38,100             29,062
.चांडिल                   बिहार             37,600             33,058
.भाखड़ा              हिमाचल प्रदेश     36,000            11,160
.इचा                  झारखण्ड             30,800             24,640
.महेश्वर            मध्य प्रदेश           20,000            12,000
.ऊपरी इन्द्रावती   ओडिशा              18,500             16,502
.तुलतुली              महाराष्ट्र            13,600               7,019
.बोधघाट              मध्य प्रदेश         12,700              9,387
.कर्जन                 गुजरात              11,600            11,600
.दमन गंगा          गुजरात                 8,700             4,237
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                                                 9,07,874         5,48,426
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          गुजरात,बिहार,आन्ध्र प्रदेश और राजस्थान से आये ऐसी ही विकास परियोजनाओं के सताए आदिवासियों की एक बड़ी विस्थापित आबादी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की झोपड़पट्टियों में वर्षों से मेहनत -मजदूरी करके अपना पेट पाल रही है। उन्हें यह भी नहीं पता कि वे जहां से उजाड़े गए थे , वहाँ क्या बनाया गया है और  उनके साथ ही अन्य विस्थापित किये गए लोगों को   पुनर्वास की कोई  व्यवस्था सरकार ने की है या नहीं।
       योजनाकारों का मानना है कि 4000 मेगावाट की क्षमता वाले थर्मल प्लांट की स्थापना में लगभग 250 परिवार विस्थापित होते हैं लेकिन इससे 10,000 लोगों को अतिरिक्त रोजगार भी मिलता है। सवाल यह है कि उस रोजगार में विस्थापित परिवारों को कितनी भागीदारी दी जाती है ? माना कि वे कुशल श्रमिक नहीं होते लेकिन हर परियोजना में 50 फीसदी से अधिक अकुशल श्रमिकों की आवश्यकता पड़ती ही है, तो वह अवसर सबसे पहले विस्थापित परिवारों के बेरोजगारों को न  दिया जाना  क्या नाइंसाफ़ी नहीं है ?
    सबसे बड़ी समस्या यह है कि किसी भी विकास परियोजना में विस्थापन पहले होता है, अर्थात लोगों के घर- बार उजाड़कर उन्हें भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है और फिर उसके बाद उजाड़े गए लोगों को पुनर्वासित  करने के लिए  पुनर्वास पॅकेज स्वीकृत होने में वर्षों का समय लग जाता है। प्रश्न यह है कि विस्थापित किये गए लोग तब तक क्या करें और क्या खाएं ? मजबूरी में वे रोजी- रोटी की तलाश में दूर शहरों की और पलायन को विवश होते हैं और उसके बाद व्यवस्थाकारों द्वारा भी वे पूरी तरह भुला दिए जाते हैं। बहुत बार तो ऐसा भी होता है कि भृष्ट अफसरशाही की मिलीभगत से पुनर्वास पॅकेज का भी बंदरबांट हो जाता है और फर्जीवाड़े के जरिये पुनर्वास की धनराशि डकार ली जाती है।
     सरकार, उद्यमियों और ठेकेदारों के लिए आदिवासी और जनजातीय लोग अशिक्षित होने के कारण हमेशा सहज शिकार रहे हैं। जहां बाँध, खनन, उद्योग या ऐसी ही अन्य परियोजनाओं के कारण लोगों का विस्थापन किया गया , वे क्षेत्र आदिवासी और जनजातीय बहुल इसलिए भी चयनित किये गए क्योंकि वहाँ  वर्षों नहीं वरन पीढ़ियों से जमीनों पर खेती-बारी करने वाले उन गरीबों के पास जमीनों के मालिकाना अधिकार प्रदर्शित करने वाले दस्तावेजी कागजात नहीं थे। जो जमीन लोगों के नाम अंकित ही नहीं उसे सरकारी ठहराकर अधिग्रहण भी आसान था। बस कब्जेदारों के सामने पुलिस ने लाठियां फटकारी , उन्हें सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे के आरोप में जेल भेजने की धमकी दी गयी और वे बेचारे भयभीत होकर इसे अपना भाग्य मानाकर्मानाकर अपनी पुश्तैनी जमीनें और घर - बार छोड़कर पलायन कर गए।यह दुर्भाग्य है कि स्वाधीनता के 65 वर्ष बीतने के बाद भी अभी तक देश की जमीनों के रिकार्ड पूरी तरह व्यवस्थित नहीं हैं।यह हाल व्यक्तिगत ही नहीं सरकारी जमीनों तक का है।इसका परिणाम यह है कि जहां ऐसी जमीनों पर भूमाफिया दबंगई और पैसे के बल पर काबिज होकर सम्पन्नता की उंचाइयां छू रहे हैं , वहीं जो पीढ़ियों से उन जमीनों पर काबिज रहे , उन्हें महज एक बन्दर घुड़की से बेदखल कर दिया जा रहा है।
  व्यवस्था के दोष   :   देश की स्वाधीनता और भारतीय लोकतंत्र की स्थापना के बाद केंद्र से लेकर राज्यों की सरकारों  तक ने विकास की योजनायें तो बनाईं। उनमें से बहुत से कार्य संपन्न भी हुए, लेकिन उनके कारण जो लोग प्रभावित हुए या हो रहे थे , उनके संरक्षण और पुनर्वास के लिए स्वाधीनता के 60 वर्षों बाद तक भी कोई स्पष्ट नीति नहीं बनायी जा सकी।जब विस्थापित लोगों का विरोध और आक्रोश जोर पकड़ने लगा और पानी सर से ऊपर गुजरने की नौबत आ गयी, तब वर्ष 2007 में सरकार ने नयी राष्ट्रीय पुनर्वास नीति " रिसेटेलमेन्ट एंड रिहेबिलिटेशन " की घोषणा की। यह नीति भी आधी- अधूरी ही थी इसलिए आक्रोश निरंतर बढ़ता रहा और केंद्र सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के नेतृत्व में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् ने वर्ष 2011 में नए "भूमि अधिगृहण , पुनर्वास एवं विस्थापन विधेयक " को तैयार किया। इस विधेयक में यह प्राविधान किया गया है कि जमीनों के अधिगृहण का काम केवल सरकार करेगी और इसके लिए निजी कंपनियों को अनुमति नहीं दी जायेगी। उल्लेखनीय है कि अभी तक यह विधेयक केवल तैयार भर किया गया है, उसे अमली जामा नहीं पहनाया जा सका है। इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता कि जिस नक्सलवाद के नए रूप माओवाद से इस समय देश के 200 से भी अधिक जिले बुरी तरह प्रभावित हैं और जिससे निपटने के लिए देश की सरकारें अब तक खरबों रुपये खर्च कर चुकी हैं, उसमें विस्थापन के आक्रोश की बहुत बड़ी भूमिका है।
                                     -    एस . एन .शुक्ल
            

Friday, 11 January 2013

लगातार घटती बेटियाँ


                              लगातार घटती बेटियाँ

   चिकित्सा  क्षेत्र में गर्भस्थ शिशु का लिंग परीक्षण एक बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है , लेकिन इसी उपलब्धि के चलते पुरुष प्रधान समाज और बेटों की चाह और बेटियों को पराया धन समझने वालों के लिए बेटियों को गर्भ में ही समाप्त कर देने का एक आसान रास्ता भी दे दिया। इस मामले में शिक्षित और खुद को प्रगतिशील मानने वाला समाज सबसे आगे रहा है। अब बेटियों की घटती संख्या को लेकर सरकार भी चिंतित है क्योंकि सारा देश और सारा समाज बेटियों की घटती संख्या के दुष्प्रभाव से बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।

       गर्भस्थ  शिशु का लिंग परीक्षण करना और करवाना अपराध की श्रेणी में तब स्वीकार किया गया जब पानी सिर से ऊपर गुजरने लगा।पहले तो सरकारी स्टार पर ही बड़े- बड़े विज्ञापन जारी कर प्रचारित किया जा रहा था की अनचाहे गर्भ से छुटकारा पाना अब आसान हो गया है। इसका परिणाम यह हुआ कि वर्ष 1961में देश में जहां प्रति एक हजार लड़कों पर लड़कियों की सँख्या 976 थी , वह पचास वर्ष बाद वर्ष 2011 आते- आते घटकर प्रति हजार लड़कों के अनुपात में 914 रह  गयी। वर्ष 2001 की जनगणना में प्रति एक हजार लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या 927 थी और केन्द्रीय योजना आयोग ने ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजनामें वर्ष 2011-12 तक लड़कियों की संख्या प्रति एक हजार लड़कों के मुकाबले 935 तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया था। इस लक्ष्य का भी वही हस्र हुआ जो प्रायः हर सरकारी योजना का होता है।लड़कियों की संख्या और अनुपात बढ़ने के बजाय और भी घट गया। वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि प्रति हजार लड़कों की तुलना में देश में लड़कियों की  वर्त्तमान संख्या 914 है। लिंग परीक्षण अब भी किये जा रहे हैं और कराये जा रहे हैं। चूंकि अब ऐसा करना और करवाना विधिक रूप से अपराध है , इसलिए जाँच परिणाम लिखित तौर पर नहीं दिए जाते और परीक्षण की दर भी कुछ अधिक ली जा रही है। जिस क्लीनिक पर लिखा टंगा है कि यहाँ गर्भस्थ शिशु का लिंग परीक्षण नहीं किया जाता, प्रायः वहीं वह सबसे ज्यादा होता है।
        सरकार और योजना आयोग भी स्वीकार कर रहा है कि लड़कियों के लगातार घटते अनुपात का  कारण कन्या भ्रूण ह्त्या के बढ़ते मामले ही हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कि कानूनन अपराध घोषित किये जाने के बावजूद अभी भी गर्भस्थ शिशुओं के लिंग परीक्षण कराये जा रहे हैं और शायद ऐसे मामले पहले की तुलना में अब और भी ज्यादा हैं।इससे चिंतित सरकार ने भले ही अगले पाँच वर्षों में प्रति हजार लड़कों पर लड़कियों की संख्या 950 तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा है, लेकिन क्या बिना जनसहयोग के और बिना समाज की सोच बदले 914 की संख्या को बढ़ाकर 950 तक पहुँचा पाना आसान होगा ?
         लड़कियों की घटती संख्या के दुष्परिणाम सामने हैं।भारत के चरित्र को विश्व में हमेशा सर्वोपरि स्थान मिलता रहा है तो रिश्तों की पवित्रता और रिश्तों के प्रति ईमानदारी में भी भारत की कोई सानी नहीं रहा है।महज पिछले दो दशक के दौरान ये सारे मापदण्ड धराशायी होते दिखे हैं। अदालत ने समलैंगिक यौन संबंधों को सहमति की दशा में अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया। यौन तुष्टि एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। जब लड़कों को लड़कियाँ नहीं मिल रहीं और परिपक्व आयु के बावजूद शादियाँ नहीं हो पा रहीं तो वे अनैतिक रास्तों से यौनाकांक्षाओं को पूरा करने की और उन्मुख होते हैं। दिल्ली लड़कियों की संख्या के मामले में सबसे पीछे है, प्रति एक हजार लड़कों के अनुपात में 866 लड़कियाँ।  साफ़ है कि प्रति एक हजार लड़कों में से 134 अर्थात साधे तेरह प्रतिशत लड़कों को कुँआरा ही रह जाना है। यौनाकांक्षायें तो फिर भी समाप्त नहीं होंगी, अर्थात व्यभिचार, अप्राकृतिक यौनाचार तथा बलात्कार की घटनाएँ बेतहाशा बढ़ेंगी। दिल्ली में लड़कियों की तादाद सबसे कम है तो उपरोक्त सारे दुष्कर्म दिल्ली में ही सबसे ज्यादा हो भी रहे हैं।

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वर्ष         प्रति हजार लड़कों पर लड़कियां
1961                976
1971                964
1981                962
1991                945
2001                927
2011                914
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सबसे कम लड़कियों वाले राज्य
दिल्ली                     866

उत्तराखण्ड               886

उत्तर प्रदेश               899

बिहार                     933

 झारखंड                 943
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       बेटियों का बचाया जाना आवश्यक है , अन्यथा सृष्टि का संतुलन गड़बड़ा जाएगा और साथ ही सामाजिक संबंधों का ताना- बाना भी।ऐसा भी नहीं है कि लड़कियों को जन्म देने के सभी विरोधी ही हों , लेकिन जिस प्रकार की यौनिक स्वच्छन्दता और उच्छ्रंखलता समाज में बढ़ती जा रही है उसे देखते हुए लोग अपनी बेटियों की सुरक्षा के प्रति कहीं अधिक आशंकित और चिंतित हैं। वे समाज को नहीं बदल सकते , माहौल को नियंत्रित नहीं कर सकते , इसलिए उन्हें सबसे कारगर उपाय यही नजर आता है कि बेटियाँ पैदा ही न होने दी जाएँ। लड़कियां होंगी तो वे शिक्षा प्राप्त करने के लिए स्कूल- कालेज भी जायेंगी और आज के अर्थ प्रधान युग में अपनी योग्यता के अनुरूप काम भी करना चाहेंगी और कमाई भी।उन्हें बाहर जाना ही होगा जहां का वातावरण उनके लिए कतई सुरक्षित नहीं है और यही वजह है कि अधिसंख्य आधुनिकता के पक्षधर माता- पिता भी बेटियों की सुरक्षा के प्रति आशंका के कारण ही उन्हें जन्म देने से हिचकिचा रहे हैं।
       योजना आयोग की योजना चाहे जो हो , लेकिन जब तक भावी माता- पिताओं के मन बेटियों की सुरक्षा के प्रति आश्वस्ति नहीं पैदा होगी , तब तक बेटियों की संख्या बढ़ा पाना आसान भी नहीं होगा। सड़क पर चलाती लड़कियों पर फब्तियाँ कसना, अशलील इशारे करना शहरों की जिन्दगी में अब आम हो गया है। ऐसे शोहदे प्रायः संपन्न घरों के कुसंस्कारों में पले लडके ही होते हैं। पुलिस मौजूदगी के बावजूद प्रायः ऐसी घटनाओं की अनदेखी करती है , यही वजह है कि शोहदों का दुस्साहस बढ़ता है और वे सामूहिक बलात्कार तक की घटनाओं को अंजाम देने में नहीं हिचकते। क्या योजना आयोग बेटियों की सामाजिक सुरक्षा की भी कोई योजना लाने जा रहा है, यदि नहीं तो महज बेटी बचाओ अभियान के फर्जी नारों से सार्थक परिणामों की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती।
        - एस .एन .शुक्ल



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