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Friday, 1 November 2013

सरदार पर सियासत

                                    सरदार पर सियासत

       भारत के प्रथम और सर्वाधिक दृढनिश्चयी गृहमंत्री, अखण्ड स्वाधीन भारत के प्रणेता और स्वप्नदृष्टा तथा अपने अडिग निर्णयों के लिए अलग पहचान का प्रतीक सरदार वल्लभभाई पटेल आज सियासत का केंद्र बिंदु बन गए हैं . कांग्रेस उन्हें अपना बताती है तो भाजपा आरोप लगाती है कि कांग्रेस ने नेहरू,इंदिरा,राजीव और वर्त्तमान में सोनिया तथा  राहुल गांधी को तो  प्राथमिकता दी किन्तु सरदार पटेल सहित अन्य त्यागी तथा वरिष्ठ कांग्रेस के ही नेताओं की पूरी तरह उपेक्षा की गयी. दोनों पार्टियों के  बीच  पटेल को लेकर जबानी युद्ध की शुरुआत तो हो ही चुकी है, शायद आगामी २०१४ के आम चु.नाव में अन्य मुद्दों के साथ ही सरदार पटेल भी भाजपा और कांग्रेस के  बीच सियासत का एक प्रमुख मुद्दा होंगे

      मतभेद तो थे नेहरू और पटेल में
(1) देश के आर्थिक मसलों और हिन्दू-मुस्लिम मुद्दे को लेकर नेहरू और पटेल के बीच कभी एक राय नहीं बन पायी किन्तु फिर भी दोनों नेताओं ने उसे सार्वजनिक मंचों पर बहस का मुद्दा नहीं बनने दिया . पटेलजी ने गांधीजी को पत्र लिखकर कहा था कि नेहरू और उनके बीच मतभेद हैं लेकिन उनके लिए देश सर्वोपरि है .
(२) मतभेदों के कारण ही भारत-पाक बटवारे के बाद फ़ैली हिंसा के दौरान नेहरू जी ने बिना पटेलजी की राय लिए अजमेर में हालात का जायजा लेने के लिए अपने दूत के तौर पर एचवीआर आयंगर को भेजा था. उस समय पटेल देश के गृहमंत्री थे, इसलिए उन्होंने नेहरूजी के इस कदम को अपने कार्य और अधिकार क्षेत्र में दखल माना और इसकी शिकायत गांधीजी से की थी . नेहरू ने बापू को स्पष्टीकरण देते हुए कहा था कि संविधान की वर्त्तमान व्यवस्था के अनुसार केन्द्रीय मंत्रिमंडल के फाइनल अथारिटी होने के बावजूद प्रधानमंत्री से उत्कृष्ट भूमिका की अपेक्षा की जाती है. जवाब में पटेल ने भी गांधीजी को लिखित तौर पर कहा था कि यदि नेहरू की सर्वोच्चता वाली अवधारणा को स्वीकार कर लिया जाय तो प्रधानमंत्री तानाशाह की तरह हो जाएगा .
(३) महज एक वर्ष के अन्दर ही मतभेद इस कदर बढ़ गए थे कि नेहरू और पटेल दोनों ही नेताओं ने अपने पदों से इस्तीफे तक की पेशकश कर डाली थी लेकिन इसी बीच ३० जनवरी १९४८ को गांधीजी ह्त्या के बाद दोनों नेताओं ने देशहित में अपने मतभेद भुला दिए .
        महापुरुषों की प्रतिमाएं स्थापित करने या उनके नाम पर स्मारक बनाने के बजाय यदि उनके विचारों को आत्मसात किया जाता, यदि उनके आचरण को जीवन में उतारा जाता तो शायद यह उन महापुरुषों के प्रति सच्ची श्रृद्धांजलि होती, किन्तु क्या देश के समूचे राजनैतिक परिदृश्य में ऐसा कुछ होता दिख रहा है ? भारत की राजनीति में महापुरुषों को वोट जुटाने का साधन बनाकर सियासी दल जिस तरह का खेल खेल रहे हैं, उसे उचित नहीं कहा जा सकता. गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा स्थापित करने का जो निर्णय लिया, उसकी आलोचना करके कांग्रेस और अन्य कई दलों ने वर्त्तमान में सरदार पटेल को भी सियासी मुददा बना दिया है .
           मोदी या मोदी की विचारधारा से सहमति या असहमति से परे हटकर यदि सोचें तो आप निश्चित तौर पर पायेंगे कि सरदार पटेल को राजनैतिक बहस का केंद्रबिंदु बनाने की अपनी योजना में नरेन्द्र मोदी पूरी तरह सफल रहे हैं. 182 मीटर ऊंची अर्थात दुनिया की सबसे ऊंची लौह प्रतिमा स्थापित करने का उनका निर्णय और वह भी अभियान चलाकर देश भर के किसानों से उनके निष्प्रयोज्य हो चुके लौह कृषि यंत्रों को मांगकर, अर्थात किसानों से सहयोग के साथ ही उनकी श्रृद्धा बटोरने का अभिनव अभियान. सरदार पटेल की 138वीं जयन्ती पर केवाडिया में नर्मदा तट पर शिलान्यास तो हो चुका, बस अब इस विशालतम " स्टैचू ऑफ़ यूनिटी " के खड़े होने की प्रतीक्षा है .
        घोषणा के साथ ही कांग्रेस विरोध में उतर पड़ी और कहा कि पटेल ने ही सबसे पहले आरएसएस पर प्रतिबन्ध लगाया था, इसलिए संघ, भाजपा या मोदी उन्हें अपना कैसे बता सकते हैं. दोनों ओर से वाकयुद्ध जारी है फिर भी सच तो यही है कि कांग्रेस या अन्य भाजपा विरोधी दल पटेल को चाहे कितना ही भाजपा या संघ की विचारधारा का विरोधी साबित करने की कोशिश करें लेकिन मोदी अपने समर्थकों ही नहीं विरोधियों तक को यह सन्देश देने में सफल रहे हैं कि कांग्रेस ने पटेल को वह सम्मान नहीं दिया, जिसके वह हकदार थे .
           इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता कि स्वाधीनता के बाद सारा देश सरदार पटेल को ही भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहता था लेकिन पंडित नेहरू की महत्वाकांक्षा के सामने गांधीजी मजबूर हो गए थे और उनकी इच्छा के चलते पंडित जवाहर लाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बन गए.ऐतिहासिक तत्थ्यों के अनुसार २९ अप्रैल १९४६ को कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के निर्वाचन में देश की कुल १५ प्रांतीय और क्षेत्रीय इकाइयों में से १२ ने गांधीजी की इच्छा के विरुद्ध सरदार पटेल के नाम पर अपनी सहमति व्यक्त की थी .बाद में गांधीजी के कहने पर ही पटेल ने अपना नाम वापस ले लिया था. यदि ऐसा न हुआ होता तो निश्चित तौर पर पटेलजी ही देश के प्रथम प्रधानमन्त्री बने होते और शायद तब देश की तस्वीर भी कुछ अलग तरह की होती .
      मंगलवार २९ अक्टूबर को अहमदाबाद में सरदार पटेल को समर्पित संग्रहालय के उदघाटन कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की उपस्थिति में यही तो कहा था भाजपा के प्रधानमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी ने कि "अगर नेहरू की जगह पटेल पहले प्रधानमंत्री होते तो आज देश की तस्वीर कुछ और होती."बाद में मनमोहन सिंह ने भी मोदी को निशाना  बनाते हुए कहा कि पटेल न केवल धर्मनिरपेक्ष थे बल्कि कांग्रेसी भी थे. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पटेल कांग्रेसी थे तो इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि नेहरू और पटेल के बीच अनेकों मुद्दों पर हमेशा मतभेद रहे. यदि पटेल पहले प्रधानमंत्री होते तो शायद जम्मू-कश्मीर के आज जो हालात हैं वे नहीं होते. कश्मीर भारत का हिस्सा रहे या पाकिस्तान का इस पर नेहरूजी जनमत संग्रह के लिए भी सहमत हो गए थे लेकिन पटेल की दृढ़ता के चलते ही कश्मीर भारत के हाथों से जाते-जाते बचा था . 
     इस बात से भला कौन इनकार करेगा कि कांग्रेस में नेहरू परिवार के अनवरत वर्चस्व के कारण सरदार पटेल,डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री जैसे अनेकों वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा की गयी. अनेकों नेताओं ने तो अपनी उपेक्षा से आहत होकर राजनीति ही छोड़ दी.यद्यपि इससे नेहरूजी की प्रशासनिक क्षमता पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगता किन्तु फिर भी यह सवाल तो उठता ही है कि क्या कांग्रेस में नेहरू परिवार के अतिरिक्त कोई नेता ही नहीं हुआ ? आखिर क्यों राष्ट्रीय स्तर पर संचालित अधिकाँश योजनाओं को केवल नेहरू-गांधी के साथ ही जोड़कर प्रस्तुत किया गया ? वह पी वी नरसिंह राव जिन्होंने कांग्रेस के दुर्दिनों में भी पार्टी और सरकार की नाव डूबने से बचाई थी, आज पार्टी में उनका कोई नाम तक लेने वाला नहीं है, क्या यह कृतघ्नता की पराकाष्ठा नहीं है ? मोदी ने यदि लौहपुरुष सरदार पटेल की विश्व में सबसे बड़ी प्रतिमा स्थापित करने का संकल्प लिया और यदि वह उस संकल्प को मूर्तरूप देने का प्रयास कर रहे हैं , तो क्या कांग्रेस द्वारा मोदी की आलोचना किया जाना केवल विरासत छिनने के भय की बौखलाहट नहीं है ?
       सरदार पटेल भले ही कांग्रेस के नेता थे लेकिन तब कांग्रेस दूसरी थी . वह कांग्रेस सारे देश की थी , सारे देश के लिए थी . क्या आज की कांग्रेस उस तरह की कांग्रेस है ? पटेल सारे राष्ट्र के नेता थे , उनमें सारे राष्ट्र की श्रृद्धा थी और शायद अभी भी है, इसलिए कोई पार्टी यह दावा नहीं कर सकती कि वह केवल उसी के थे . पटेल ही क्या सारे ही राष्ट्रीय नेता सम्पूर्ण राष्ट्र की अमूल्य थाती हैं , उन्हें कोई भी सम्मान देना चाहता है तो उसका प्रयास सराहा जाना चाहिए फिर चाहे सम्मान देने वाले की विचारधारा उससे मिलाती हो अथवा न मिलाती हो. आज मोदी पर निशाना साधा जा रहा है तो मोदी भी पटेल की उपेक्षा की बात उठाकर कांग्रेस का मुह बंद करने का प्रयास कर रहे हैं , लेकिन लोग तो सवाल करेंगे ही कि जो आज मोदी करने जा रहे हैं वह खुद कांग्रेस ने क्यों नहीं किया ? डॉ भीम राव अम्बेडकर भी तो कांग्रेस के ही नेता थे लेकिन आज बहुजन समाज पार्टी उनकी विरासत की सबसे बड़ी दावेदार है. बसपा ने अम्बेडकर जी की विरासत को कांग्रेस के हाथों से चीन लिया और कांग्रेस कुछ नहीं कर सकी . इसी तरह यदि कल को मोदी भी पटेल की विरासत को कांग्रेस के हाथों से छीन लेते हैं तो कांग्रेस क्या करेगी ?
     यद्यपि सच्चाई यही है कि वोट बिखरने के भय से कांग्रेस सरदार पटेल को लेकर मोदी पर आक्रामक है तो दूसरी ओर इस रार में मोदी भी अपना राजनैतिक हित देख रहे हैं . लेकिन फिर भी पटेलजी की प्रतिमा की स्थापना मोदी का सराहनीय प्रयास है और उसे स्वीकार किया ही जाना चाहिए .
                                             
                                                     -एस एन शुक्ल 

3 comments:

  1. सुन्दर प्रस्तुति-
    शुभकामनायें- आदरणीय--

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  2. लोहा है हर देह में, भरा अंग-प्रत्यंग |
    मगर अधिकतर देह में, मोह-मेह का जंग |

    मोह-मेह का जंग, जंग लड़ने से डरता |
    नीति-नियम से पंगु, कीर्ति कि चिंता करता |

    लौह पुरुष पर एक, हमें जिसने है मोहा |
    किया एकजुट देश, लिया दुश्मन से लोहा ||

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  3. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।। त्वरित टिप्पणियों का ब्लॉग ॥

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