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Wednesday, 20 February 2013

प्रिय महोदय/महोदया,

जर्नलिस्ट्स, मीडिया एण्ड रायटर्स वेलफेयर एसोसिएशन द्वारा पूर्व में प्रकाशित स्मारिका "श्रम साधना" की अपार लोकप्रियता के बाद हम "स्वाधीनता के 65 वर्ष और भारतीय संसद के 6 दशक" की गति-प्रगति, उत्कर्ष-पराभव, गुण-दोष, लाभ-हानि, समस्याओं तथा सुधारात्मक उपायों  पर आधारित सम्पूर्ण  विवेचन-विश्लेषण को

                    "समसामयिक दस्तावेज़"

के रूप में प्रकाशित करने जा रहे हैं। प्रष्ठों  की संख्या 1000 से भी अधिक होने की संभावना  है और आकार ए-4 साइज (11गुणे 8 इंच)

                 "समसामयिक दस्तावेज़" में समाहित विषय सामग्री :-

 प्रथम खण्ड  

.भारत एक दृष्टि में,महत्वपूर्ण तथ्य, भारत का राजनैतिक स्वरूप, जनगणना के आंकड़े, राज्य, कृषि , खनिज, उद्यम , परिवहन, प्राचीन इतिहास, प्राचीन भारत, मध्यकालीन भारत, युरॊपियों  का भारत में प्रवेश और आधिपत्य स्थापन, 

द्वितीय खण्ड 

विद्रोह और उनके नायक, प्रमुख धार्मिक, सामाजिक और जनजातीय आन्दोलन, स्वाधीनता आन्दोलन, मुक्ति संघर्ष की प्रमुख घटनाएँ, राष्ट्र विभाजन की पीड़ा, लोकतंत्र की स्थापना, गांधीजी की हत्या, गणतंत्र बना भारत, अपना संविधान, भारत के राष्ट्रपति , प्रधानमंत्री, उप प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष, लोकसभा अध्यक्ष, मुख्या न्याधीश और उनके कार्यकाल।

 तृतीय खंड 

.जिनके कुशल नेतृत्व में की ओर बढ़ा भारत, समाजसेवा और सामाजिक चेतना के नायक, ज्ञान के वाहक, दुश्मनों के बार-बार के आक्रमण, अन्न संकट का दौर, पाकिस्तान का विभाजन और बंगलादेश का उदय, जनरल मानेक शा , जब इंदिरा गांधी दुर्गा का प्रतिमान बनीं, संजय गांधी का राजनैतिक क्षितिज पर उदय, अलगाववादी आन्दोलन,जयप्रकाश आन्दोलन, आपातकाल , केंद्र में प्रथम गैर कांग्रेसी  सरकार, जनता पार्टी का बिखराव, केंद्र में पुनः कांग्रेस  की वापसी, खालसा  आंदोलन और आपरेशन ब्लू स्टार, इंदिराजी की ह्त्या और सिख विरोधी दंगे, युवा प्रधानमंत्री राजिव,लिट्टे और उसका तांडव, दलित चेतना के महानायक कांशीराम, किसानों के अगुआ  महेंद्र सिंह टिकैत,वी पी सिंह का कार्यकाल,

चतुर्थ खण्ड 

 राम मंदिर आन्दोलन की उग्रता, साम्प्रदायिक तनाव का दौर, बाबरी ध्वंश और उसके बाद की राष्ट्रीय पीड़ा, पी वी नरसिंह राव, निर्वाचन आयोग की सक्रियता, गोधरा और गुजरात दंगें, आतंकी घटनाओं से जूझता देश, सियासत का चारित्रिक पतन, धरमनिर्पेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता, सामाजिक सरोकारों के योद्धा राजनीति में क्षत्रपों का उदय, विदेशी बैंकों में जमा स्वदेशी कालाधन, पॊञ्जिवादिओन के गुलाम मीडिया समूह, चारण और भाटों की भूमिका में कारपोरेट मीडिया, जनाक्रोश, न्याय व्यवस्था की दुरिह्ताएं, अव्यवस्थित पंचायतीराज व्यवस्था, सता और पूंजी का घालमेल, क्षेत्रीयता की संकुचित राजनीति , नापाक सियासी गठजोड़, स्वाधीन भारत कीमहत्वपूर्ण  उपलब्धियां,जिन्होंने फहराई भारत की यश पताका , उम्मीद भरे नेतृत्वकर्ता।

पांचवां खण्ड 

.ज्वलंत मुद्दे :-मूल अधिकारों से वंचित आम आदमी, साम्प्रदायिकता और जातीयता, अनवरत भ्रष्टाचार, वैश्विक बिरादरी में भारत की गिरती साख, दोषपूर्ण  न्याय व्यवस्था, राजनीति का अपराधीकरण , कुनबों की गिरफ्त में सियासत, लोकतंत्र बनाम लूटतंत्र, योजनागत लाभों का असंगत वितरण, असमान  और महंगी शिक्षा, प्रतिभा और योग्यता की उपेक्षा, अमानवीय पुलिसतंत्र, असहाय न्याय व्यवस्था, आरक्षण की दोषपूर्ण व्यवस्था, नैतिकता ताख पर, उपेक्षित अन्नदाता, अपसंस्कृति  के मकड़जाल में युवा, शिक्षित बेरोजगारों की बढ़ती  जमात, सेवक नहीं शासक की भूमिका में नौकरशाही, घटती बेटियाँ, उपेक्षित आधी आबादी, उच्च और तकनीकी शिक्षा का व्यवसायीकरण, उपेक्षित  गाँव, असंवैधानिक जनप्रतिनिधित्व, अपात्रों के हवाले योजनाओं का लाभ, शिक्षा के मंदिरों में सियासी अखाड़े,

और साथ में

छठा खण्ड 

 अन्य वह विषय सामग्री जिसकी कि इस प्रकार के दस्तावेज़ में अपेक्षा की जा सकती है तथा देश के विद्वान  लेखकों के आलेख, रचनाएं, विचार, और सुधारात्मक उपाय


हम आपसे  सहयोग, समर्थन, शुभकामनाओं और उत्साहवर्धन की अपेक्षा करते हैं। जल्द ही 'समसामयिक दस्तावेज़ ' नियमित साप्ताहिक के रूप में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराएगा ।


आप अपने  आलेख  journalistsindia@gmail.com, jmwa@in.com पर प्रेषित करें।

विस्तृत या अन्य किसी प्रकार प्रकार की जानकारी के सम्बन्ध में संपर्क करें ;-

 एस .एन .शुक्ल , +919455038215

Sunday, 27 January 2013

विस्थापन, अर्थात अपने ही देश में शरणार्थी

       स्वाधीनता के पैंसठ वर्ष और इन पैंसठ वर्षों में देश के छः करोड़ 50 लाख से भी अधिक लोग विकास के नाम पर अपने ही देश में बेघर कर दिए गए। औसत प्रति वर्ष 10 लाख से भी अधिक लोगों के आशियाने उजाड़े गए और उन्हें फिर से बसाने की चिंता देश की किसी भी सरकार ने नहीं की। यह आरोप नहीं सच्चाई है जिसे पिछले दिनों ही डब्लू जी एच आर की रिपोर्ट में स्वीकार किया गया है। ऐसी ही अनेक योजनाओं से धनपति और उद्यमी तो मालामाल हुए लेकिन वहां के बाशिंदे बेघर  और कंगाल। वे गरीब वर्षों से न्याय की उम्मीद में भटक रहे हैं, क्या कभी पोछे जा सकेंगे उनके आँसू  ?

        वह भाखड़ा  नांगल बाँध , जिसके निर्माण पर इस देश ने अपने हाथों अपनी पीठ थपथपाई थी, लेकिन देश की यह बड़ी उपलब्धि सबसे अधिक महगी देश के उन 2180 परिवारों को साबित हुयी, जिनके आशियानों और रोटी देने वाले खेतों को इस विशाल बाँध ने निगल लिया।वर्ष 1963 में उजाड़े गए इन परिवारों में से  पच्चीस वर्ष बाद  1988 में महज 730 परिवारों को ही पुनः बसाया जा सका, शेष 1450 परिवार कहाँ गए, क्या कर रहे हैं और हैं भी या नहीं , इसे जानने की जरूरत इस देश की व्यवस्था ने आज तक नहीं महसूस की।
       केवल भाखड़ा ही नहीं, देश के अन्य बांधों के निर्माण  में भी अब तक 1 करोड़ 64 लाख लोग विस्थापित किये गए तो खनन के कारण 25 लाख 50 हजार,उद्यमों की स्थापना में 12 लाख 50 हजार तथा अन्य विकास परियोजनाओं के कारण 11 लाख से अधिक लोग बेघर कर दिए गए। यह 1950 के बाद से लेकर अब तक का अधिकृत आंकड़ा है, जबकि वास्तविक सँख्या कहीं इससे भी अधिक हो सकती है। विस्थापितों की इस संख्या में वे लोग शामिल नहीं हैं जो वर्षों से उन अधिगृहीत की गयी जमीनों पर खेती- बारी तो कर रहे थे लेकिन उनके पास उन जमीनों से सम्बंधित ऐसे कोई अभिलेख नहीं थे जिससे वे खुद को उन जमीनों का मालिक साबित कर सकें। वर्किंग ग्रुप आन ह्यूमन राइट्स इन इंडिया ( w g h r ) की गत वर्ष प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार देश की स्वाधीनता के बाद से अब तक देश के लगभग साधे छः करोड़ लोगों को विकास परियोजनाओं के चलते विस्थापन का दंश झेलना पड़ा।
       उल्लेखनीय है कि पूरी दुनिया में शरणार्थियों की संख्या 1.5 करोड़ से 1.6 करोड़ के बीच है तो अकेले भारत में विकास के नाम पर साधे छः करोड़ लोग बेघर कर दिए गए, अर्थात अपने ही देश में शरणार्थियों से भी बदतर  बना दिए गए , क्या यह स्थिति दुखद एवं भयावह नहीं है ? बांधों और जलाशयों के अधिकाँश निर्माण उन क्षेत्रों में ही किये गए जहां बहुतायत संख्या में आदिवासी परिवार रहते थे। प्रस्तुत 17 बड़े बांधों के निर्माण में कुल 9, 07, 874 लोग विस्थापित हुए तो  से 5, 48, 426 लोग अर्थात 60.41 फीसदी लोग जनजातीय परिवारों के थे।आदिवासी प्रायः अशिक्षित होते हैं। उन्हें अपने अधिकारों और क़ानून के बारे में जानकारी नहीं होती। उनके लिए तो पुलिस ही अदालत है और पुलिस ही क़ानून।जब ठेकेदारों और अधिकारियों से उपकृत होकर पुलिस  को धमकाती है तो वे प्रतिरोध नहीं कर पाते और बिना विस्थापन के मुआवजे की प्रतीक्षा किये ही रोजी-रोटी की तलाश में बड़े शहरों की ओर निकल जाते हैं।
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बड़े बांधों ने सबसे अधिक आदिवासी उजाड़े 

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क्रम  परियोजना          राज्य       विस्थापितों की         आदिवासी 
                                                      कुल संख्या    
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  सरदार सरोवर      गुजरात        2,00000        1,15,200
  पोलावरम           आन्ध्र प्रदेश    1,50000           79,350
  मेथान /पांचेत      बिहार              93,874            53,001
  पोंग                   हिमाचल प्रदेश   80,000            45,000
  कोयल कारो         बिहार              66,000            58,080
 उकई जलाशय        गुजरात          52,000              9,838
 माही बजाज सागर राजस्थान       38,400             29,292
 इवमपल्ली           आन्ध्र प्रदेश      38,100             29,062
.चांडिल                   बिहार             37,600             33,058
.भाखड़ा              हिमाचल प्रदेश     36,000            11,160
.इचा                  झारखण्ड             30,800             24,640
.महेश्वर            मध्य प्रदेश           20,000            12,000
.ऊपरी इन्द्रावती   ओडिशा              18,500             16,502
.तुलतुली              महाराष्ट्र            13,600               7,019
.बोधघाट              मध्य प्रदेश         12,700              9,387
.कर्जन                 गुजरात              11,600            11,600
.दमन गंगा          गुजरात                 8,700             4,237
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                                                 9,07,874         5,48,426
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          गुजरात,बिहार,आन्ध्र प्रदेश और राजस्थान से आये ऐसी ही विकास परियोजनाओं के सताए आदिवासियों की एक बड़ी विस्थापित आबादी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की झोपड़पट्टियों में वर्षों से मेहनत -मजदूरी करके अपना पेट पाल रही है। उन्हें यह भी नहीं पता कि वे जहां से उजाड़े गए थे , वहाँ क्या बनाया गया है और  उनके साथ ही अन्य विस्थापित किये गए लोगों को   पुनर्वास की कोई  व्यवस्था सरकार ने की है या नहीं।
       योजनाकारों का मानना है कि 4000 मेगावाट की क्षमता वाले थर्मल प्लांट की स्थापना में लगभग 250 परिवार विस्थापित होते हैं लेकिन इससे 10,000 लोगों को अतिरिक्त रोजगार भी मिलता है। सवाल यह है कि उस रोजगार में विस्थापित परिवारों को कितनी भागीदारी दी जाती है ? माना कि वे कुशल श्रमिक नहीं होते लेकिन हर परियोजना में 50 फीसदी से अधिक अकुशल श्रमिकों की आवश्यकता पड़ती ही है, तो वह अवसर सबसे पहले विस्थापित परिवारों के बेरोजगारों को न  दिया जाना  क्या नाइंसाफ़ी नहीं है ?
    सबसे बड़ी समस्या यह है कि किसी भी विकास परियोजना में विस्थापन पहले होता है, अर्थात लोगों के घर- बार उजाड़कर उन्हें भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है और फिर उसके बाद उजाड़े गए लोगों को पुनर्वासित  करने के लिए  पुनर्वास पॅकेज स्वीकृत होने में वर्षों का समय लग जाता है। प्रश्न यह है कि विस्थापित किये गए लोग तब तक क्या करें और क्या खाएं ? मजबूरी में वे रोजी- रोटी की तलाश में दूर शहरों की और पलायन को विवश होते हैं और उसके बाद व्यवस्थाकारों द्वारा भी वे पूरी तरह भुला दिए जाते हैं। बहुत बार तो ऐसा भी होता है कि भृष्ट अफसरशाही की मिलीभगत से पुनर्वास पॅकेज का भी बंदरबांट हो जाता है और फर्जीवाड़े के जरिये पुनर्वास की धनराशि डकार ली जाती है।
     सरकार, उद्यमियों और ठेकेदारों के लिए आदिवासी और जनजातीय लोग अशिक्षित होने के कारण हमेशा सहज शिकार रहे हैं। जहां बाँध, खनन, उद्योग या ऐसी ही अन्य परियोजनाओं के कारण लोगों का विस्थापन किया गया , वे क्षेत्र आदिवासी और जनजातीय बहुल इसलिए भी चयनित किये गए क्योंकि वहाँ  वर्षों नहीं वरन पीढ़ियों से जमीनों पर खेती-बारी करने वाले उन गरीबों के पास जमीनों के मालिकाना अधिकार प्रदर्शित करने वाले दस्तावेजी कागजात नहीं थे। जो जमीन लोगों के नाम अंकित ही नहीं उसे सरकारी ठहराकर अधिग्रहण भी आसान था। बस कब्जेदारों के सामने पुलिस ने लाठियां फटकारी , उन्हें सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे के आरोप में जेल भेजने की धमकी दी गयी और वे बेचारे भयभीत होकर इसे अपना भाग्य मानाकर्मानाकर अपनी पुश्तैनी जमीनें और घर - बार छोड़कर पलायन कर गए।यह दुर्भाग्य है कि स्वाधीनता के 65 वर्ष बीतने के बाद भी अभी तक देश की जमीनों के रिकार्ड पूरी तरह व्यवस्थित नहीं हैं।यह हाल व्यक्तिगत ही नहीं सरकारी जमीनों तक का है।इसका परिणाम यह है कि जहां ऐसी जमीनों पर भूमाफिया दबंगई और पैसे के बल पर काबिज होकर सम्पन्नता की उंचाइयां छू रहे हैं , वहीं जो पीढ़ियों से उन जमीनों पर काबिज रहे , उन्हें महज एक बन्दर घुड़की से बेदखल कर दिया जा रहा है।
  व्यवस्था के दोष   :   देश की स्वाधीनता और भारतीय लोकतंत्र की स्थापना के बाद केंद्र से लेकर राज्यों की सरकारों  तक ने विकास की योजनायें तो बनाईं। उनमें से बहुत से कार्य संपन्न भी हुए, लेकिन उनके कारण जो लोग प्रभावित हुए या हो रहे थे , उनके संरक्षण और पुनर्वास के लिए स्वाधीनता के 60 वर्षों बाद तक भी कोई स्पष्ट नीति नहीं बनायी जा सकी।जब विस्थापित लोगों का विरोध और आक्रोश जोर पकड़ने लगा और पानी सर से ऊपर गुजरने की नौबत आ गयी, तब वर्ष 2007 में सरकार ने नयी राष्ट्रीय पुनर्वास नीति " रिसेटेलमेन्ट एंड रिहेबिलिटेशन " की घोषणा की। यह नीति भी आधी- अधूरी ही थी इसलिए आक्रोश निरंतर बढ़ता रहा और केंद्र सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के नेतृत्व में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् ने वर्ष 2011 में नए "भूमि अधिगृहण , पुनर्वास एवं विस्थापन विधेयक " को तैयार किया। इस विधेयक में यह प्राविधान किया गया है कि जमीनों के अधिगृहण का काम केवल सरकार करेगी और इसके लिए निजी कंपनियों को अनुमति नहीं दी जायेगी। उल्लेखनीय है कि अभी तक यह विधेयक केवल तैयार भर किया गया है, उसे अमली जामा नहीं पहनाया जा सका है। इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता कि जिस नक्सलवाद के नए रूप माओवाद से इस समय देश के 200 से भी अधिक जिले बुरी तरह प्रभावित हैं और जिससे निपटने के लिए देश की सरकारें अब तक खरबों रुपये खर्च कर चुकी हैं, उसमें विस्थापन के आक्रोश की बहुत बड़ी भूमिका है।
                                     -    एस . एन .शुक्ल
            

Friday, 11 January 2013

लगातार घटती बेटियाँ


                              लगातार घटती बेटियाँ

   चिकित्सा  क्षेत्र में गर्भस्थ शिशु का लिंग परीक्षण एक बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है , लेकिन इसी उपलब्धि के चलते पुरुष प्रधान समाज और बेटों की चाह और बेटियों को पराया धन समझने वालों के लिए बेटियों को गर्भ में ही समाप्त कर देने का एक आसान रास्ता भी दे दिया। इस मामले में शिक्षित और खुद को प्रगतिशील मानने वाला समाज सबसे आगे रहा है। अब बेटियों की घटती संख्या को लेकर सरकार भी चिंतित है क्योंकि सारा देश और सारा समाज बेटियों की घटती संख्या के दुष्प्रभाव से बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।

       गर्भस्थ  शिशु का लिंग परीक्षण करना और करवाना अपराध की श्रेणी में तब स्वीकार किया गया जब पानी सिर से ऊपर गुजरने लगा।पहले तो सरकारी स्टार पर ही बड़े- बड़े विज्ञापन जारी कर प्रचारित किया जा रहा था की अनचाहे गर्भ से छुटकारा पाना अब आसान हो गया है। इसका परिणाम यह हुआ कि वर्ष 1961में देश में जहां प्रति एक हजार लड़कों पर लड़कियों की सँख्या 976 थी , वह पचास वर्ष बाद वर्ष 2011 आते- आते घटकर प्रति हजार लड़कों के अनुपात में 914 रह  गयी। वर्ष 2001 की जनगणना में प्रति एक हजार लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या 927 थी और केन्द्रीय योजना आयोग ने ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजनामें वर्ष 2011-12 तक लड़कियों की संख्या प्रति एक हजार लड़कों के मुकाबले 935 तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया था। इस लक्ष्य का भी वही हस्र हुआ जो प्रायः हर सरकारी योजना का होता है।लड़कियों की संख्या और अनुपात बढ़ने के बजाय और भी घट गया। वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि प्रति हजार लड़कों की तुलना में देश में लड़कियों की  वर्त्तमान संख्या 914 है। लिंग परीक्षण अब भी किये जा रहे हैं और कराये जा रहे हैं। चूंकि अब ऐसा करना और करवाना विधिक रूप से अपराध है , इसलिए जाँच परिणाम लिखित तौर पर नहीं दिए जाते और परीक्षण की दर भी कुछ अधिक ली जा रही है। जिस क्लीनिक पर लिखा टंगा है कि यहाँ गर्भस्थ शिशु का लिंग परीक्षण नहीं किया जाता, प्रायः वहीं वह सबसे ज्यादा होता है।
        सरकार और योजना आयोग भी स्वीकार कर रहा है कि लड़कियों के लगातार घटते अनुपात का  कारण कन्या भ्रूण ह्त्या के बढ़ते मामले ही हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कि कानूनन अपराध घोषित किये जाने के बावजूद अभी भी गर्भस्थ शिशुओं के लिंग परीक्षण कराये जा रहे हैं और शायद ऐसे मामले पहले की तुलना में अब और भी ज्यादा हैं।इससे चिंतित सरकार ने भले ही अगले पाँच वर्षों में प्रति हजार लड़कों पर लड़कियों की संख्या 950 तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा है, लेकिन क्या बिना जनसहयोग के और बिना समाज की सोच बदले 914 की संख्या को बढ़ाकर 950 तक पहुँचा पाना आसान होगा ?
         लड़कियों की घटती संख्या के दुष्परिणाम सामने हैं।भारत के चरित्र को विश्व में हमेशा सर्वोपरि स्थान मिलता रहा है तो रिश्तों की पवित्रता और रिश्तों के प्रति ईमानदारी में भी भारत की कोई सानी नहीं रहा है।महज पिछले दो दशक के दौरान ये सारे मापदण्ड धराशायी होते दिखे हैं। अदालत ने समलैंगिक यौन संबंधों को सहमति की दशा में अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया। यौन तुष्टि एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। जब लड़कों को लड़कियाँ नहीं मिल रहीं और परिपक्व आयु के बावजूद शादियाँ नहीं हो पा रहीं तो वे अनैतिक रास्तों से यौनाकांक्षाओं को पूरा करने की और उन्मुख होते हैं। दिल्ली लड़कियों की संख्या के मामले में सबसे पीछे है, प्रति एक हजार लड़कों के अनुपात में 866 लड़कियाँ।  साफ़ है कि प्रति एक हजार लड़कों में से 134 अर्थात साधे तेरह प्रतिशत लड़कों को कुँआरा ही रह जाना है। यौनाकांक्षायें तो फिर भी समाप्त नहीं होंगी, अर्थात व्यभिचार, अप्राकृतिक यौनाचार तथा बलात्कार की घटनाएँ बेतहाशा बढ़ेंगी। दिल्ली में लड़कियों की तादाद सबसे कम है तो उपरोक्त सारे दुष्कर्म दिल्ली में ही सबसे ज्यादा हो भी रहे हैं।

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वर्ष         प्रति हजार लड़कों पर लड़कियां
1961                976
1971                964
1981                962
1991                945
2001                927
2011                914
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सबसे कम लड़कियों वाले राज्य
दिल्ली                     866

उत्तराखण्ड               886

उत्तर प्रदेश               899

बिहार                     933

 झारखंड                 943
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       बेटियों का बचाया जाना आवश्यक है , अन्यथा सृष्टि का संतुलन गड़बड़ा जाएगा और साथ ही सामाजिक संबंधों का ताना- बाना भी।ऐसा भी नहीं है कि लड़कियों को जन्म देने के सभी विरोधी ही हों , लेकिन जिस प्रकार की यौनिक स्वच्छन्दता और उच्छ्रंखलता समाज में बढ़ती जा रही है उसे देखते हुए लोग अपनी बेटियों की सुरक्षा के प्रति कहीं अधिक आशंकित और चिंतित हैं। वे समाज को नहीं बदल सकते , माहौल को नियंत्रित नहीं कर सकते , इसलिए उन्हें सबसे कारगर उपाय यही नजर आता है कि बेटियाँ पैदा ही न होने दी जाएँ। लड़कियां होंगी तो वे शिक्षा प्राप्त करने के लिए स्कूल- कालेज भी जायेंगी और आज के अर्थ प्रधान युग में अपनी योग्यता के अनुरूप काम भी करना चाहेंगी और कमाई भी।उन्हें बाहर जाना ही होगा जहां का वातावरण उनके लिए कतई सुरक्षित नहीं है और यही वजह है कि अधिसंख्य आधुनिकता के पक्षधर माता- पिता भी बेटियों की सुरक्षा के प्रति आशंका के कारण ही उन्हें जन्म देने से हिचकिचा रहे हैं।
       योजना आयोग की योजना चाहे जो हो , लेकिन जब तक भावी माता- पिताओं के मन बेटियों की सुरक्षा के प्रति आश्वस्ति नहीं पैदा होगी , तब तक बेटियों की संख्या बढ़ा पाना आसान भी नहीं होगा। सड़क पर चलाती लड़कियों पर फब्तियाँ कसना, अशलील इशारे करना शहरों की जिन्दगी में अब आम हो गया है। ऐसे शोहदे प्रायः संपन्न घरों के कुसंस्कारों में पले लडके ही होते हैं। पुलिस मौजूदगी के बावजूद प्रायः ऐसी घटनाओं की अनदेखी करती है , यही वजह है कि शोहदों का दुस्साहस बढ़ता है और वे सामूहिक बलात्कार तक की घटनाओं को अंजाम देने में नहीं हिचकते। क्या योजना आयोग बेटियों की सामाजिक सुरक्षा की भी कोई योजना लाने जा रहा है, यदि नहीं तो महज बेटी बचाओ अभियान के फर्जी नारों से सार्थक परिणामों की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती।
        - एस .एन .शुक्ल



       blog link : snshukla.blogspot.com

Tuesday, 8 January 2013

अव्यवस्था: दोष किसका

                                  अव्यवस्था: दोष किसका 


       भारतीय प्रेस परिषद् के अध्यक्ष मार्केंडेय काटजू ने कहा कि देश के 90 फीसदी भारतीय मूर्ख हैं। जिस पर देश की मीडिया ने आपत्ति जताई और इसे जस्टिस काटजू के विवादित बयानों की श्रंखला में एक और विवादित बयान करार दिया। पर क्या वास्तव में जस्टिस काटजू द्वारा दिया गया बयान विवादित या अमर्यादित है जबकि आज भी हमारा सामाजिक ताना- बाना जातिगत और धार्मिक विचारधारा  से ग्रसित है। कहने को तो हम आधुनिक है पर हमारी आधुनिकता का असली परिचय मौजूदा दौर में अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा माध्यम बन चुकी सोशल नेटवर्किंग साईटों पर बखूबी दीखता है, जहाँ प्रतिदिन हम जातिगत और धार्मिक लड़ाई लड़ते रहते है लेकिन वास्तविक जीवन में सर्वथा विपरीत आचरण करते हैं। दोष देश और देश की व्यवस्था का देते हैं , तब क्या हम खुद दोषी नहीं हैं ?
          स्वाधीनता के पैंसठ वर्ष बीत गए और भारतीय संसद के छ दशक, अर्थात स्वाधीनता प्राप्ति के बाद से लेकर लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना के बीच जन्म लेने वाली एक समूची पीढी अब बुजुर्गों में गिनी जाती है।वह पीढी तो लगभग समाप्त प्राय है जिसने देश की आज़ादी की लड़ाई में सक्रीय भूमिका निभाई थी, या जिसने उस संघर्ष और ब्रिटिश सरकार के दमन के दौर को अपनी आँखों से देखा था।आज की युवा पीढी नहीं जानती कि वह देश की जिस आज़ाद हवा में सांस ले रही है, उसे हासिल करने में कितने देशभक्तों ने क्या-क्या सहा , कितनी कुर्बानियां दीं और कितने त्याग तथा बलिदानों की नीव पर भारतीय लोकतंत्र की इमारत बुलंद हुयी।
         राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का जन्मदिवस देश की वर्त्तमान पीढी के लिए अब शायद ही कोई प्रेरणा देता हो,वरन यह उनके लिए बस एक छुट्टी का दिन है। नेताजी सुभाषचंद बोष का जन्म दिवस किस तिथि को होता है , यह देश के 70 फीसदी पढ़े-लिखे लोगों को भी पता नहीं है। आज़ाद, भगत सिंह, बिस्मिल,रोशन सिंह, राजेन्द्र लाहिड़ी , ऊधम सिंह की कुर्बानियां भी विस्मृत प्राय हो चुकी हैं, तो जिन राजनैतिक दलों अथवा सामाजिक संगठनों के बड़े-बड़े इश्तहारों में उन्हें आदर्श बताकर प्रचारित किया जाता है, वे उनके नामों को ब्राण्ड बनाकर अपनी दुकानें चलाते नज़र आ रहे हैं। आज का स्वाधीन भारत जिस और जैसे रूप में है वैसे स्वाधीन भारत की कल्पना तो गाँधी , सुभाष या हमारे क्रांतिवीरों ने नहीं की होगी।
         अपनी श्रेष्ठ परम्पराओं,अपने सामाजिक आदर्शों, अपने उच्चतम चरित्र, अपने ज्ञान और अपने मानव मूल्यों के कारण कभी जगदगुरू माना जाता रहा भारत यदि लम्बे समय तक परतंत्र रहा तो उसका कारण भी उसकी उदारमना प्रवृत्ति ही थी , और साथ ही अधिसंख्य भारतीयों की भावना कि " कोउ नृप होय हमहि का हानी " जैसी प्रवृत्ति। लोग दूसरों के दुःख से दुखी नहीं होते वरन अपने दुःख और दूसरों का सुख देखकर दुखी होते हैं। यह देश की आम आदत सी बन गयी है कि जब तक खुद पर संकट नहीं आता , तब तक लोगों की भावनाओं में उबाल भी नहीं आता। ट्रेनों, बसों और बाज़ारों की भीड़ में लड़कियों के साथ शोहदों की छेड़खानी को लोग चुपचाप देखते रहते हैं। लफंगों-गुण्डों की ज्यादती खुद के साथ न हो तो मुह फेरकर चले जाते हैं, जैसे कि  मुर्दे हों। तभी बुलंद होते हैं अराजक तत्वों के हौसले और चाँद लफंगे भीड़ पर भारी पड़ते हैं।बात यहीं तक सीमित नहीं है, बहुत से लोग तो अनायास अराजक तत्वों के समर्थन में खड़े होते भी दिखाते हैं। यह सब नया भी नहीं है। कभी शकों, हूणों , गौरी,गजनबी, सिकंदर,लोदी और मुगलों की मुट्ठी भर ताकतें विशाल भारत के लिए चुनौतियाँ बनीं। लुटेरों ने इस भीरु देश को केवल लूटा ही नहीं यहाँ आकर शासक भी बन बैठे। फिर वही डचों,पुर्तगालियों और अंग्रेजों ने भी किया। ब्रिटेन की एक व्यापारिक कंपनी ने इस देश की उदारता (भीरुता) का लाभ उठाकर देश पर राज करना प्रारम्भ कर दिया और सारा देश देखता रहा।
           ढाई सौ वर्ष की अंग्रेजों की गुलामी! इस बीच यदि किसी ने उनके विरोध में आवाज भी उठायी तो उसे जनसमर्थन नहीं मिल सका। वजह यह कि हम हिन्दू थे, मुसलमान थे ,सवर्ण थे, दलित थे, सैकड़ों जातियों-उपजातियों और सम्प्रदायों के बीच बाते हुए, जिनके बीच व्यावहारिक संबंधों का पूरी तरह अभाव था।ईश्वरीय न्याय पर भरोसा करने वाला देश लगातार अपनी गति को प्राप्त होता रहा।देश की स्वाधीनता के लिए अंग्रेजों से लोहा लेने वाले तब भी चंद  लोग ही थे। लम्बी लड़ाई के बाद स्वाधीनता मिली भी तो भी हम मानसिक गुलामी से मुक्त नहीं हो पाए। आज हम राजनैतिक दलों के गुलाम हैं। देश की 121 करोड़ की जनसंख्या किसी एक अपरिपक्व नेतृत्वकर्ता की और बड़ी अपेक्षाओं से देखने लगती है। जब उसके विरोधी उसकी आलोचना करते हैं तो यह देश उसके पक्ष और विपक्ष में बताने लगता है बिना किसी सार्थक बहस के, बिना किसी तर्क के और बिना अपने विवेक के इस्तेमाल के।सच समझाने और विवेक जगाने की जिम्मेदारी जिस बुद्धिजीवी वर्ग की होनी चाहिए वह बंद कमरों में बहस तो कर सकता है लेकिन जनता को जगाने और उसकी अगुवाई करने का साहस नहीं कर सकता।
       हम अफवाहों पर बहुत जल्दी भरोसा कर लेते हैं।सपने दिखाने वालों के पीछे दौड़ने लगते हैं। समग्र क्रान्ति के नारों के रथ पर सवार होकर सत्ता हथियाने वाली जनता पार्टी जब निजी स्वार्थों में फिर टुकड़ों में बात गयी तो उसके नेताओं का गिरेबान पकड़कर किसी ने पूछने की किसी ने जरूरत नहीं महसूस की कि कहाँ है उनकी सम्पूर्ण क्रान्ति। जब वी . पी . सिंह ने बोफोर्स टॉप सौदे में दलाली के आरोप लगाकर जनता का समर्थन हासिल कर राजीव सरकार को धकिया कर  सत्ता हथिया ली तो किसी ने उन पर सच को सामने लाने का दबाव नहीं बनाया। जब राम मंदिर आन्दोलन को हथियार बनाकर भाजपा सत्ता सुख भोग रही थी तो किसी ने यह नहीं पूछा कि जिस मुद्दे को लेकर उनहोंने देश की पुरातात्विक धरोहर नेस्त - नाबूद कर दी , उसके लिए वे क्या कर रहे हैं। हर चुनाव में एक नया नारा और हम सियासी कलंदरों के इशारे पर बंदरों की तरह नाचने वाले लोग, क्या यही भारत की नियति है ?

                                              गुनाहगार जनता भी है 

       आये दिन राजनैतिक पाले बदलने वाले लोग कभी इस दल और कभी उस दल की नाव पर सवार होकर चुनावी वैतरणी पार कर जाते हैं।  वोट देकर उन्हें  माननीय बनाने वाले तो आम मतदाता ही हैं, फिर क्या राजनीति और राजनेताओं से ज्यादा गुनहगार वे स्वयं नहीं हैं ? जो राजनेता पिछले चुनाव में दूसरे दल की आलोचना कर रहा था , उसकी नीतियों को जनविरोधी बता रहा था , यदि आज वह पाला बदलकर उसी दल की वकालत कर रहा है तो मतदाता उससे क्यों नहीं पूछते कि कल तक तो आप दूसरा ही राग आलाप रहे थे।
        सबसे बड़ी जिम्मेदारी मीडिया तंत्र की है जो खुद को समाज का सजग प्रहरी, लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहते हुए ख़म ठोकता रहता है। प्रायः चुनावों के दौरान वे यह तो बताते हैं कि कौन कहाँ कमजोर या भारी पड़ रहा है लेकिन क्या मीडिया का यह दायित्व नहीं है की वह गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले राजनेताओं से सावधान रहने की जनता से अपील भी करे। मीडिया  तंत्र शासन, प्रशासन और जनता के बीच की कड़ी है ,तो उसकी यह जिम्मेदारी है कि वह जनसमस्याओं , जन आक्रोश की जानकारी शासन-प्रशासन तक पहुंचाए और यदि शासन- प्रशासन में कोई खामियां हैं तो उनसे जनता को भी आगाह करे। देश में जिस मतदाता वर्ग की सबसे अधिक संख्या है और जो मतदान में सबसे अधिक भागीदारी निभाता है, जिसकी सत्ता सौंपने और सत्ता हस्तांतरण में सबसे अधिक भूमिका है , उसका अधिकाँश हिस्सा शिक्षा और ज्ञान में सबसे अधिक पिछड़ा है।वे हर चुनाव में राजनेताओं और राजनैतिक दलों द्वारा बरगलाये जाते हैं और चुनाव सम्पन्न हो जाने के बाद वही सबसे अधिक उपेक्षित भी किये भी जाते हैं।उन्हें जगाना और सचेत करना मीडिया का पहला कर्त्तव्य है। यदि वह ऐसा नहीं करता तो क्या उसकी सजग प्रहरी की भूमिका संदेहास्पद नहीं है ?
         यदि आज भारत की प्रतिष्ठा विश्व समुदाय के बीच घटी है तो उसके लिए केवल देश की राजनीति ही जिम्मेदार नहीं है।हम स्वयं भी कम दोषी नहीं हैं। एक प्राचीन बोध कथा याद आती है कि एक बार हंस के एक जोड़े (नर-मादा ) ने लम्बी उड़ान भरी ,इतनी लम्बी कि  दिन का प्रकाश शेष रहते उनकी वापसी संभव नहीं रह गयी। फिर लम्बी उड़ान की थकान भी थी इसलिए हंस और उसकी मादा ने एक गाँव के बाहर खड़े बड़े से पेड़ पर रात बिताने का निश्चय किया।गाँव कुछ उजाड़-उजाड़ सा था इसलिए रात को हंसिनी ने हंस से गाँव की दुर्दशा के प्रति जिज्ञाशा प्रकट की तो हंस ने बताया कि इस गाँव पर एक उल्लू की कुदृष्टि पद रही है इसीलिये गाँव बर्बादी की ओर  उन्मुख है।
         उल्लू उसी पेड़ की जड़ में बने कोटर में बैठा था। उसे अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं हुयी और जब सुबह हंस का जोड़ा फिर अपनी उड़ान की तैयारी कर रहा था , तो उल्लू ने हंस से कहा कि तुम जहां चाहो जा सकते हो , लेकिन यह हंसिनी नहीं जायेगी, क्योंकि यह मेरी है।हंस ने प्रतिवाद किया कि तुझ जैसी निम्न कोटि के पक्षी की हंसिनी कौन मान लेगा भला ? उल्लू ने कहा कि फिर इस बात का फैसला गाँव वालों से ही करा लो , जो वर्षों से इसे मेरे साथ इसी पेड़ पर रहते देख रहे हैं।
         हंस इस बात पर सहमत हो गया। उसे विशवास  था कि गाँव के लोग यह झूठ नहीं बोलेंगे कि हंसिनी उस उल्लू के साथ पेड़ पर रह रही होगी। फिर दोनों पक्ष गाँव की पंचायत के सामने थे और उल्लू ने पंचों के सामने दावा ठोकते हुए कहा कि यह हंसिनी वर्षों से उसके साथ गाँव के बाहर पेड़ पर रही है , आज यह हंस उसे अपनी बताकर अपने साथ ले जाने की जिद कर रहा है, इसलिए मैं आप पंचों के पास न्याय के लिए आया हूँ। आप लोग जो भी फैसला करेंगे वह हम दोनों पक्षों को स्वीकार्य होगा।
         पंचों ने थोड़ी देर आपस में कानाफूसी की और सबने तय किया कि यदि वे सच कहेंगे तो हंस अपनी मादा को लेकर उड़ जाएगा। यदि वे उसे उल्लू की बता देंगे तो वह यहीं रहेगी और गाँव के लोगों को भी रोज हंसिनी के दर्शन का लाभ मिलेगा। फिर  था , पंचों ने समवेत स्वर में कहा कि हंसिनी तो उल्लू की ही है क्योंकि उसे वर्षों से उसी के साथ गाँव के बाहर पेड़ पर रहते देखा जा रहा है। हंस शर्त हार चुका था, पंचों से उसे न्याय नहीं मिला, इसलिए वह हंसिनी को वहीं  छोड़ खिन्न मन से चल दिया।
            अभी वह कुछ कदम ही गया होगा कि उल्लू पंख फराफराता हुआ उसके पास पहुँचा और बोला,ठहरो ! हंस ने अनिक्षा से उसकी और देखा और बोला, अब क्या चाहते हो ? उल्लू बोला मैं चाहता कुछ भी नहीं, तुम्हारी हंसिनी भी नहीं, लेकिन जो तुम रात को कह  रहे थे कि यह गाँव उल्लू की कुदृष्टि के कारण बर्बादी की कगार पर है, क्या अब भी वही मानते हो ? अरे जिस गाँव के लोग पक्षियों में सर्वश्रेठ हंसिनी को उल्लू की बता सकते हैं, उल्लू को सौंप सकते हैं , वे अपने कर्मों की वजह से बर्बादी की और जा रहे हैं या उल्लू की कुदृष्टि के कारण ?
      यही कहावत इस समय इस देश पर भी चरितार्थ हो रही है। जाति , धर्म, सम्प्रदाय , क्षेत्र और ऊँच - नीच के फिरकों में बाते देश के लोग यदि सत्ता की हंसिनी उल्लुओं को सौंपकर खुश हो रहे हैं , तो इस देश को बर्बादी से कौन बचा सकता है ?
    
                         - एस .एन .शुक्ल
       blog link : snshukla.blogspot.com

Thursday, 27 December 2012

जनसरोकारों का विरोधी है कारपोरेट मीडिया

                      जनसरोकारों का विरोधी है कारपोरेट मीडिया 

        पिछले डेढ़ दशक के दौरान मीडिया का विस्तार बहुत तेजी से हुआ है और इस विस्तार में मीडिया का वास्तविक स्वरुप उतनी तेजी से विकृत भी हुआ है। इस समय देश का शायद ही कोई ऐसा कारपोरेट घराना होगा जिसका अपना मीडिया हाउस न हो अथवा जिसके पास मीडिया हाउसों के शेयर न हों। यही वजह है कि लोकतंत्र का प्रहरी कहे जाने वाले मीडिया की भूमिका कारपोरेट घरानों के चौकीदारों में बदल गयी है। उनके पास अनाप-शनाप पैसा है और इसी पैसे ने समाचार-पत्रों के बहुरंगी तथा बहुपृष्ठीय संस्करणों की बाद पैदा की तो बड़े-बड़े इलेक्ट्रानिक चैनलों की प्रतिस्पर्धा को भी जन्म दिया है।आज 32 या 40 पृष्ठों तक का बहुरंगी समाचार-पत्र महज चार रुपये में उपलब्ध हो जाता है। प्रकाशन संस्थान अपने वितरकों/ विक्रेताओं को अंकित मूल्य पर 40 फीसदी तक कमीशन देता है, कुछ फीसदी वितरकों/ हाकरों की बिकने से बची प्रतियां वापस भी लेता है और सुदूर क्षेत्रों या जिलों न\में समाचार-पत्रों के बण्डल स्वयं किराए के वाहनों से पहुंचाने की व्यवस्था भी करता है। अंततः चार रुपये के अखबार की बिक्री में प्रकाशन को अधिकतम डेढ़ रुपये ही वापस मिलता है जबकि कागज़, छपाई तथा अन्य खर्चों को मिलाकर ऐसे अखबारों की लागत कीमत करीब 12 रुपये प्रति कापी बैठती है।
        अब सवाल उठाता है कि इतना घाटा उठाकर मीडिया हाउस अखबार कैसे चला रहे हैं , कैसे प्रकाशित कर पा रहे हैं ? और इसका जवाब यह है कि कोई भी उद्यमी या व्यापारी कभी घाटे का व्यापार नहीं करता, अर्थात ऐसे सभी अखबार दिन दूनी- रात चौगुनी आर्थिक प्रगति कर रहे हैं।वे सरकारी सुविधाओं और विज्ञापनों का वह हिस्सा भी डकार रहे हैं जो अन्य छोटे और मध्यम श्रेणी के अखबारों का है। इनके खिलाफ उठने वाली छोटे और मध्यम श्रेणी के समाचार माध्यमों की आवाज़ भी इसलिए नहीं सुनी  जाती क्योंकि सरकारी विज्ञापन मान्यता और प्रेस मान्यता समितियों में भी कारपोरेट घरानों के मीडिया हाउसों के ही चाकर, दलाल और गुर्गे बिठा दिए गए हैं, जो खुद में पत्रकार से अधिक दलाल हैं। वे सरकारों व सरकारी प्रतिष्ठानों तथा अपने मीडिया हाउसों के हितों के बीच सेतु का काम करते हैं। वे अपने मालिकों के अन्य उद्यमों और व्यवसाय के लिए सरकारों से ठेका , परमिट, कोटा, लाइसेंस, छूट-कटौती और सरकारी सुविधाओं का लाभ दिलवाते हैं और उसके बदले सरकारों का प्रशाश्तिगान करतेहैं। सच मायने में  वे समाचार माध्यमों के सम्पादक नहीं रह जाते, उनकी भूमिका चारण और भाटों की हो जाती है जो अपने अन्नदाता को प्रसन्न रखने के लिए उसकी स्तुति के शलोक रचा करते हैं। क्या आज के मीडिया हाउसों का सच इसके अतिरिक्त भी कुछ है ?
             अब प्रश्न यह है कि क्या ऐसे समाचार माध्यमों से यह उम्मीद की जा सकती है कि वे अपने मालिकान कारपोरेट घरानों अथवा उस सरकारी तंत्र की खामियों,गलतियों और गड़बडियों को सार्वजनिक करने का साहस कर सकते हैं , जिससे वे रोजी पा रहे हैं और लगातार उपकृत हो रहे हैं ?इसका जवाब नहीं में ही होगा , तो फिर आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि कारपोरेट मीडिया कभी ऐसा सच भी सामने लाने का जोखिम उठाएगा जो उसके मालिकों और पृष्ठपोशकों  की असलियत को बेनकाब करने वाला हो ?यह बात केवल मैं ही नहीं कह रहा और न ही यह कोई मनगढ़ंत आरोप हैं क्योंकि इसी सत्य को रेखांकित करते हुए भारतीय प्रेस परिषद् के वर्त्तमान अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कांडेय काटजू कई बार कह चुके हैं कि " कारपोरेट समाचार मीडिया हमेशा वास्तविक मुद्दों से ध्यान हटाकर बेमतलब के मुद्दों को ज्यादा अहमियत देता है।"
         जो सच को छुपाने के गुनहगार हैं , वे सच कहने वालों के स्वाभाविक विरोधी हैं, यही कारण है कि आजकल भारतीय प्रेस परिषद् के वर्त्तमान अध्यक्ष न्यायमूर्ति काटजू के खिलाफ कारपोरेट मीडिया छद्म अभियान चला रहा है तो कई बार लघु एवं माध्यम श्रेणी का मीडिया भी बड़ों की देखादेखी अज्ञानता में काटजू की आलोचना करता नज़र आता है। बड़े कारपोरेट घरानों का प्रिंट के साथ ही इलेक्ट्रानिक मीडिया क्षेत्र में भी वर्चश्व , मीडिया प्रशिक्षण संस्थानों का संचालन , अर्थात देश के अधिकाँश मीडिया क्षेत्र पर कब्जा और स्वामित्व के कारण ही देश में बेतरह भृष्टाचार को बढ़ावा मिला है। वजह यह कि जो भृष्टाचार के माध्यम से अनाप-शनाप कमाई कर रहे हैं वे ही ऐसे मीडिया हाउसों के बड़े आर्थिक मददगार हैं तो बहुत सारे साझीदार भी, फिर क्या उनसे जनसरोकारों और सच की अपेक्षा बेमानी नहीं है ?
          भारतीय प्रेस परिषद् के पूर्व अध्यक्ष न्यायमूर्ति पी .वी .सावंत ने अपने कार्यकाल के दौरान कारपोरेट मीडिया के एकाधिकार को तोड़ने के लिए को-आपरेटिव मीडिया की स्थापना की वकालत की थी , लेकिन उनकी वह बात केवल बात ही रह गयी और उसे भृष्ट सरकारी तंत्र तथा कारपोरेट मीडिया घरानों के गठजोड़ ने साजिश के तहत दफ़न कर दिया। सामाजिक् अधिकारों के पक्ष में आयोजित होने वाले धरने-प्रदर्शन और जनांदोलनों की आवाज़ दबाने में भी कारपोरेट मीडिया की बड़ी भूमिका रही है, क्योंकि ऐसे आन्दोलनों से उनके मालिकों और प्रिष्ठापोशकों के हित प्रभावित होते हैं। यही कारण है कि देश में अब उस मीडिया पर भी हमले होने लगे हैं जिसे जनसरोकारों का मुखर वक्ता और लोकतंत्र का प्रहरी कहा जाता था।प्रायः ऐसे हमलों के शिकार वे लोग होते हैं जो गुनहगार नहीं हैं  अर्थात वे रिपोर्टर जो समाचारों का संकलन करते हैं।वे तो सच को ही मीडिया हाउसों  तक पहुंचाते हैं लेकिन वहां बैठे मीडिया मैनेजर ( कथित सम्पादक) उस सच को कभी सार्वजनिक नहीं होने देते। वे सोचते हैं कि वे जनाक्रोश से सुरक्षित हैं और जो जनता के बीच जाकर समाचारों या चित्रों का संकलन करते हैं वे जनता के गुस्से का शिकार होने के बाद भी मीडिया हाउस की भूमिका पर उंगली नहीं उठा सकते क्योंकि तब उनके सामने रोजी-रोटी का सवाल खडा हो जाता है। लेकिन ऐसे मीडिया हाउस भी अब सुरक्षित नहीं हैं क्योंकि सच देर से ही सही अब जनता की समझ में आने लगा है, और यत्र -तत्र ही सही उनके कुचक्र के खिलाफ आवाज भी उठाने लगी है।
       संपादकों का राष्ट्रीय संगठन एडीटर्स गिल्ड तथा पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन होने का दावा  करने वाले संगठनों की शीर्ष समितियों में वर्षों से कोई बदलाव नहीं हुआ। प्रबंधन अपने सदस्यों के सर गिनाकर अपने और अपनों के लिए सरकारी सुविधाएं हासिल करता है, विदेश यात्राएं करता है और राजनेताओं की अनुकम्पा हासिल करने के लिए कभी उन्हें सम्मानित करता है तो कभी उनकी स्तुति गान करता है। वास्तविक पत्रकारों और मीडियाकर्मियों को उन संगठनों में सदस्यता प्राप्त करने में बाधाएं हैं क्योंकि संगठनों पर काबिज लोगों को उनसे अपना एकाधिकार समाप्त होने का खतरा है। यही कारण है कि पिछले एक दशक के दौरान कई नए पत्रकार और मीडिया संगठनों का उदय हो चुका है और उनमें से कई वास्तव में पत्रकार हितों की लड़ाई लड़ते और जनसरोकारों के पक्ष में मुखरता से खड़े होते नज़र आ रहे हैं। कारपोरेट मीडिया घरानों की सम्पन्नता और सामर्थ्य के सामने नगण्य और बौने साबित हो रहे लघु और माध्यम समाचार माध्यमों को मजबूरन एकजुट होना पद रहा है जबकि वर्त्तमान में वास्तविक असली मीडिया की भूमिका का वे ही निष्ठापूर्वक निर्वहन कर रहे हैं और वे ही उपेक्षित हैं।
         शिक्षा,स्वास्थ्य,पेयजल,बिजली, रोजगार,श्रीमिक, किसान, दिहाड़ी मज़दूर, रिक्शे-ठेलेवाले और खोमचेवालों की पीड़ा से कितना सरोकार रखता है कारपोरेट मीडिया ? यह सब तो लघु और माध्यम श्रेणी के समाचार माध्यमों में ही दीखता है और उसकी आवाज़ वर्षों से नक्कारखाने में तूती की आवाज़ की तरह दबाई जाती रही है। कथित न्यूज चैनलों का हाल तो और भी अधिक बुरा है। वे सनसनीखेज समाचारों की होड़ में शामिल हैं तो उनमें सेलेब्रेटीज,भूत-प्रेत की काल्पनिक कहानियां,क्रिकेट,फिल्म,उद्यमी और फ़िल्मी दुनिया की शादियाँ,अपराध, सनसनी,झूठ और मनगढ़ंत भविष्यवानियों को प्रसारित करने की प्रतिस्पर्धा के अतिरिक्त शायद ही कुछ दीखता हो। इस झूठ से समाज बुरी तरह प्रभावित होता है। शायद लोग भूले नहीं होंगे कि  किस तरह वर्ष 2012 में महाप्रलय और दुनिया के समाप्त हो जाने की भविष्यवाणी इन्हीं चैनलों द्वारा भयावह रूप में प्रसारित की जा रही थी। 2012 बीत गया , देश क्या सारी दुनिया में भी ऐसा कुछ नहीं हुआ।
          अब समय आ गया है कि स्वार्थ में आकंठ डूबे न्याय और सच को दबाने वाले मीडिया हाउसों और उनके मालिकों की साजिश के खिलाफ जनता को जगाया जाय और भ्रष्टों, अपराधियों और कारपोरेट मीडिया के गठजोड़ के खिलाफ लोगों को एकजुट किया जाय। यही जनसरोकार है और यही मीडिया का वास्तविक धर्म भी।
                                                                                                                        -एस .एन .शुक्ल 

Friday, 14 December 2012

भारतीय राजनीति में बाल ठाकरे और अडवाणी

भारतीय राजनीति में बाल ठाकरे और अडवाणी 

देश की दो बड़ी राजनैतिक शाख्शियतें शिवसेना सुप्रीमों बाल ठाकरे और भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण अडवानी चाहे वे खुद विवादों में रहें हों या विवाद का कारण बने हों लेकिन भारतीय राजनीति में उनके योगदान उनके नजरिये और उनकी महत्ता को नकारा नहीं जा सकता। हम उनकी विचारधारा से असहमत हो सकते हैं लेकिन भारतीय राजनीति में हम उनकी हैसियत को अस्वीकार नहीं कर सकते।
           व्यक्ति हो या सत्ता समाज में उसकी स्वीकार्यता उसके प्रभाव या दबाव का परिणाम होती है। दबाव की स्वीकार्यता भय या स्वार्थ के कारण होती है और वह तभी तक रहती है जब तक सत्ता है या व्यक्ति जीवित है। सत्ता और व्यक्ति के अंत के साथ ही उसकी जनस्वीकार्यता भी समाप्त हो जाती है, किन्तु जहां स्वीकार्यता प्रभाव के कारण होती है वहां वह सत्ता चले जाने या व्यक्ति के समाप्त हो जाने पर भी समाप्त नहीं होती। यह बात इसलिए भी प्रासंगिक हो जाती है कि पिछले दिनों शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे की म्रत्यु पर उनकी अंतिम यात्रा में उमड़ी अपार भीड़ और बिना किसी दबाव के मुंबई बंद में किन अर्थों में देखा जाना चाहिए ? मान लेते हैं कि बाला साहेब ठाकरे की ताकत के भय से लोग उनके सामने सिर झुकाते थे, किन्तु उनके निधन के बाद तो आम लोगों का वह भय समाप्त हो जाना चाहिए था। अंतिम यात्रा में जितनी भीड़ बाल ठाकरे के लिए उमड़ी उतनी तो शायद इससे पहले देश में किसी भी लोकप्रिय नेता के अंतिम दर्शन के लिए नहीं उमड़ी होगी। खुलेआम संविधान, चुनाव आयोग, अदालत और व्यवथा को चुनौती देने वाले ठाकरे में कुछ तो ऐसा था कि देश का क़ानून भी उनके सामने सहम उठता था, और शायद इसकी वजह उनकी दबंगई नहीं उनकी लोकप्रियता थी।
          हाजी मस्तान, सुकर नारायण बखिया,यूसुफ़ पटेल और मोहन ढोलकिया जैसे तस्कर सम्राटों की बम्बई में "आमची मुम्बई" का नारा बुलंद करने वाले बाला साहेब ठाकरे ने अपने कृतित्व और प्रयासों से मराठियों के बीच अपनी जो छवि बनायी थी, उसके कारण बड़े-बड़े बाहुबली भी उन्हें चुनौती देने की बात तो दूर उनके सामने सर झुकाने को मज़बूर थे।यह वह दौर था जब देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई (तब बम्बई ) पूरी तरह  तस्कर सम्राटों और उनके गुर्गों के आधिपत्य में थी। बाला साहेब ने न केवल  उन्हें चुनौती दी वरन उनके आधिपत्य को भी तोड़ा।छत्रपति शिवाजी को आदर्श मानकर उन्हीं के नाम पर शिवसेना बनाई , मुम्बई नगर निगम के महापौर से लेकर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, प्रधानमंत्री, यहाँ तक कि देश का राष्ट्रपति तक बनाने में अहम् भूमिका निभाई लेकिन खुद के लिए किसी राजनैतिक पद की चाहत नहीं रखी। दृढ़ निश्चयी, जो कह दिया वह पत्थर की लकीर हो गया।झुकना और बात को तोड़-मरोड़कर कहना उनकी फितरत में नहीं था।यह सच है कि अपनी ताकत का कई बार उन्होंने बेजा इश्तेमाल भी किया और लगातार आलोचनाओं और विवादों से भी घिरे रहे, लेकिन दूसरा सच यह भी है कि जिसके सर पर उन्होंने वरद हस्त रख दिया, उसकी और टेढ़ी नज़र से देखने का दुस्साहस न तो दाउद इब्राहीम जैसा अंतर्राष्ट्रीय माफिया सरगना कर पाया और न ही सरकार। सोचिये क्या  बाला साहेब की मृत्यु पर लता मंगेसकर ने यूं ही कह दिया था कि " आज वह अपने आप को अनाथ महसूस कर रही हैं।
         बाल ठाकरे ने कभी दुहरी जिन्दगी नहीं जी। खुली किताब जैसी उनकी जिन्दगी थी तो शराब का शौक और सिगार के कश तक डंके की नोक पर। लोग उन्हें मुस्लिम विरोधी ठहराते रहे हैं, लेकिन तब वे भूल जाते हैं कि शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के वह कितने बड़े मुरीद थे।उनकी साफगोई और बेबाकीपन ने ही उन्हें लोगों का चहेता बनाया।उन्होंने लोगों को राजनीति के शिखर पर बिठाया , खुद नहीं बैठे तो जो इतिहास रचकर उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा, उस रिक्ति को भविष्य में शायद ही कोई भर सके।
           ऐसा ही कुछ भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी के बारे में भी कहा जा सकता है। याद करें 1985 के लोकसभा चुनाव को, जब सारे देश से भाजपा को महज दो सीटों पर ही सफलता हासिल हो पायी थी। अटल बिहारी जैसे नेतृत्व के बावजूद हाशिये पर पहुँच गयी भाजपा के बारे में तब कोई यह सोच भी नहीं सकता था कि वह किसी दिन केंद्र में सत्तारूढ़ होगी और कांग्रेस का विकल्प बनकर खड़ी हो जायेगी।बाद में ऐसा हुआ और वह करिश्मा कर दिखानेवाले बाजपेयी जी नहीं, लाल कृष्ण आडवाणी थे। लोग कहते हैं कि भाजपा राम मंदिर आन्दोलन के रथ पर सवार होकर, और हिन्दुओं की भावनाएं भड़काकर केंद्र में सत्तारूढ़ हुयी, यदि यही सच्चाई है तो संघ तो आपातकाल के बाद से ही विश्व हिन्दू परिषद् के नेतृत्व में राम मंदिर का झंडा उठाये घूम रहा था, फिर 1985 के चुनाव में भाजपा को सिर्फ दो लोकसभा सीटों पर ही क्यों सिमट जाना पडा था ?
        राम मंदिर मसले को अचानक सारे देश का मुद्दा बना देने का श्रेय  आडवाणी जी को ही जाता है। वह भाजपा जिस पर रूढ़िवादिता और साम्प्रदायिकता के आरोप लगते रहे हैं उसके अखिल भारतीय स्वरुप को मूर्तरूप देने का काम भी आडवाणी ने ही किया था। उन्होंने कांग्रेस की कथित धर्मनिरपेक्षता को खुली चुनौती देते हुए देश की राजनीति को विवादास्पद ही सही लेकिन एक नया दृष्टिकोण , एक नयी दिशा दी। यह वह समय था जब कांग्रेस के समाजवाद के विरुद्ध विकल्प के रूप में अगर कुछ था तो वह वामपंथी विचारधारा ही थी। सच यह है कि स्वयं आधी कांग्रेस इसी वामपंथी सोच और विमर्श से जूझ रही थी। बुद्धिजीवी वर्ग समझ रहा था कि कांग्रेस का गांधी के दर्शन और सिद्धांतों से कोई वास्ता नहीं है, इसलिए वामपंथ को विकल्प के रूप में देखा जाने लगा था।
          आडवाणी की रथ यात्रा और राष्ट्रवाद के साथ हिन्दू आस्था की घुट्टी ने वह करिश्मा कर दिखाया जो अप्रत्याशित था।यह करिश्मा इसलिए भी था क्योंकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ( आर एस एस ) के जिस हिंदुत्व को देश का हिन्दू बुद्धिजीवी ही रूढ़िवादिता कहकर नकार रहा था, उसी हिंदुत्व के पक्ष में आडवानी ने केवल उत्तर प्रदेश या उत्तर भारत ही नहीं सारे देश में एक बड़ा समर्थक बुद्धिजीवी वर्ग खडा कर दिया। सुधीन्द्र कुलकर्णी, गिरिलाल जैन और चन्दन मित्रा जैसे साम्यवाद के हिमायती बुद्धिजीवियों को हिंदुत्व का प्रखर समर्थक बनाने का श्रेय आडवाणी को ही जाता है, और इतना ही नहीं दक्षिण भारत में भाजपा की नीव डालने में भी सर्वाधिक योगदान उन्हीं का है।
          यह सच है कि अटल बिहारी जैसा वक्ता उस समय देश में शायद कोई दूसरा नहीं था। उनकी सभाओं में उन्हें सुनाने के लिए अपार भीड़ उमड़ती थी लेकिन वह भीड़ वोटों की शक्ल में नहीं बदल पाती थी। आडवाणी ने उस भीड़ को वोटों में बदला, केंद्र में कांग्रेस के वर्चस्व को तोड़ा और भाजपा को शहरों से गावों तक आम और ख़ास के बीच स्वीकार्य बनाया। आज यदि भाजपा को ही कांग्रेस के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है तो उसका सिला आडवाणी को ही जाता है। इतना ही नहीं राजग जब भाजपा के नेतृत्व में केन्द में सत्तारूढ़ हुआ तो उसके घटक दलों ने भले ही बाजपेयी के उदारवाद के चलते भाजपा का नेतृत्व स्वीकार किया लेकिन उन्हें सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की तरफ मोड़ने वाले तो आडवाणी ही थे। बाला साहब अब नहीं हैं, आडवाणी जी अभी भी चुस्त-दुरुस्त हैं लेकिन वयोवृद्ध तो हैं ही। हम उनके नजरिये से असहमत हो सकते हैं, उन्हें संकीर्ण विचारधारा का पोषक कहकर उनकी आलोचना कर सकते हैं, लेकिन भारतीय राजनीति में उनके योगदान और उनकी हैसियत को अस्वीकार नहीं कर सकते।
                      
                                 - एस .एन .शुक्ल

Thursday, 13 December 2012

नम्बरदार मीडिया का सच

नम्बरदार मीडिया का सच

          फेशबुक पर 12 दिसंबर को डॉ रहीस सिंह द्वारा पोस्ट की गयी टिप्पणी वास्तव में सोचने को विवास करती है कि आज देश का मीडिया क्या वास्तव में जनसरोकारों से कटता जा रहा है। उनकी टिप्पणी का सार संक्षेप यह था कि उनके घर पर दुनिया के नंबर एक अखबार का प्रतिनिधि बताकर दो सज्जन आये और उन्होंने उनकी धर्म पत्नी से कहा कि यदि वे 100 रूपये जमा करेंगी तो उन्हें एक प्लास्टिक की बाल्टी उपहार में दी जाएगी और एक माँ तक अखबार की प्रतियां मुफ्त में दी जायेंगी उसके बाद में उनका 100 रूपया भी लौटा दिया जाएगा। डॉ रहीस सिंह के अनुसार जवाब में उनकी पत्नी ने कहा कि वे तो उनका अखबार पढ़ती ही नहीं हैं क्योंकि उस नंबर वन कहे जाने वाले अखबार में समाचार का स्तर बहुत न्यून होता है और सारा अखबार विज्ञापनों से पता पडा रहता है। उक्त घटना पर डॉ रहीस सिंह ने ही टिप्पणी करते हुए लिखा था कि "मेरी पत्नी घरेलू महिला हैं यदि किसी गृहिणी की खुद को नंबर वन प्रचारित करने वाले समाचार पत्र के प्रति ऐसी धारणा है तो आम पाठक और बुद्धिजीवी वर्ग का नजरिया क्या होगा ? 
          डॉ रहीस सिंह जैसे वरिष्ठ स्तंभकार आर नियमित लेखक की पत्नी एक गृहिणी ही सही, लेकिन पढी-लिखी हैं और चूंकि घर का माहौल उस तरह का है, इसलिए उन्हें समाचारों के स्तर का आकलन भी बखूबी आता है। यह स्तर क्यों गिर रहा है इसकी वज़ह यह है कि वह चाहें नंबर एक अखबार हो, नंबर दो, तीन, चार या पाँच वे सभी कार्पोरेट घराने के अखबार हैं, जिनमें पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के बजाय प्रशासनिक अधिकारियों, उनकी पत्नियों उप पत्नियों और उद्यमियों के नाम से आलेख और स्तंभ प्रकाशित होते रहते हैं। वे क्या लिखते या लिखवाते होगें यह परिभाषित करने की आवश्यकता नहीं है। अधिकारी लिखेगा तो सरकार को सराहेगा, कमियों पर वार्निश लगाएगा, सरकारी योजनाओं की तारीफों के पुल बांधेगा और उद्यमी लिखेगा तो अपने हित की बात, जहां सच नहीं होगा। सच लिखने का साहस कोई प्रशासनिक अधिकारी और उद्यमी या व्यापारी कर ही नहीं सकता क्योंकि उन्हें तो जो भी वर्तमान सरकार हो उसके सामने जी सर, राइट सर की भूमिका में ही रहना है।
           जहां तक समाचारों की बात है तो तथाकथित बड़े कहे जाने वाले समाचार पत्र समूहों ही नहीं इलेक्ट्रानिक मीडिया चैनलों में भी अहंकार इस कदर हावी है कि उनके नियंता खुद के केबिनों में बैठकर ही मान लेते हैं कि वे जो भी परोस रहें हैं वाही पाठक और दर्शक की पसंद है, तथा उनके अलावा पाठकों और दर्शकों के सामने कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है। ऐसे समाचार माध्यमों का सच उनके मालिकों की पूंजी में इजाफा और खुद की ख़ुशी है, क्योंकि मामला नौकरी और रोजो-रोटी का है। वही दूसरा सच भी है कि बड़े कहे जाने वाले अखबारों और चैनलों को सम्पादकों तथा बुद्धजीवियों की आवश्यकता ही नहीं है, उन्हें तो केवल तिकड़मबाज़ मैनेज़र और सिद्धहस्त दलाल चाहिए। यदि ऐसे लोग अखबार की रूपरेखा तय करेंगें, तो फिर आम आदमी भी उन पर उसी तरह उंगली उठाएगा जिस तरह डॉ रहीस सिंह जी की पत्नी ने खुद को दुनिया का नंबर एक कहे जाने वाले अखबार प्रचारित करने वाले समाचार पत्र के खिलाफ उठाई थी।
           जो देश की सरकारी नीतियों में आम जनता के साथ हो रहा है, वही समाचार माध्यमों के साथ भी हो रहा है। देश में प्रत्यक्ष योजनायें आम आदमी के विकास की बनायी जाती हैं, लेकिन उद्यमियों के हितों के लिए उसी आम आदमी की जमीनें जबरन अधिगृहीत कर ली जाती हैं, उन्हें बेघर कर दिया जाता है और आम आदमी के विरोध करने पर उस पर बर्बरतापूर्वक पुलिस की लाठियों और गोलियों से उसका दमन किया जाता है।पश्चिम बंगाल का सिंगुर और नंदीग्राम तथा उत्तर प्रदेश का भट्ठा-पारसौल व दादरी इसके जीते-जागते उदाहरण हैं।यही समाचार माध्यमों की भी दशा है। मीडिया हाउसों के उद्यमी मालिकान, मीडिया संगठनों के शीर्ष पर कारपोरेट घरानों के कर्ता-धर्ता  और मान्यता समितियों में दलालों के वर्चस्व के चलते आप मीडिया से निष्पक्षता की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं ? भारत के दृश्य-श्रृव्य एवं प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) की नीतियों के अनुसार सरकारी विज्ञापनों का 70 फीसदी लघु एवं मध्यम श्रेणी के समाचार पत्रों को और शेष 30 फीसदी बड़े अखबारों को दिया जाना तय है, लेकिन जब से मीडिया हाउसों पर कारपोरेट घरानों का आधिपत्य हुआ है तब से डीएवीपी भी उल्टी गंगा बहा रहा है।वजह यह है कि वहां भी सरकारी अधिकारी/कर्मचारी ही बैठे हैं जो सत्ता तंत्र के निर्देशों की अवहेलना नहीं कर सकते। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि राज्यों से लेकर केंद्र तक की सत्ता अब बड़े उद्यमियों और दलालों के इशारे पर नाचने को विवश है। वे राजनैतिक दलों के बड़े आर्थिक मददगार हैं, मीडिया हाउसों के मालिक भी हैं, इसलिए सरकारें उनके हितों की नीतियाँ बनाने को विवश हैं।
          आज का मीडिया खबरें गढ़ कर प्रसारित करता है, जो सच से शायद ही वास्ता रखती हों। वह सनसनी बेचता है, अपराधों की रोंगटे खड़ी कर देने वाली कहानियां बेचता है, सेलिब्रिटीज़ के प्रेम-प्रसंग, गाशिप, मंगनी, शादी और किसका किसके साथ अफेयर चल रहा है। किसी बड़े उद्यमी ने शादी में आये बारातियों को कौन से महंगें तोहफे दिए, दहेज़ में कौन-कौन सा कीमती सामान दिया गया, दुल्हन के लहंगे और चोली कहाँ बनें, कितने कीमती थे और उनका रंग कौन सा था, दूल्हे ने कौन सा लिबास पहन रखा था, उसे किस नामी डिज़ायनर ने डिजाइन किया था। दावत में कौन-कौन से लज़ीज़ व्यंज़न बने थे और उनमें कौन सी बड़ी हस्तियों ने शिरकत की, अब यही ख़बरें मीडिया की प्राथमिकता में है। विश्वास नहीं होता तो अभी हाल में ही संपन्न हुई सैफ-करीना की शादी या पिछले वर्षों में ऐश्वर्या-अभिषेक बच्चन की शादी के समय अखबार और पत्रिकाओं का कलेवर देखिये और देखये की कैसे महीनों तक बेगानी शादी के ये अब्दुल्ला दीवाने अब्दुल्ला महीनों तक उन्हीं कहानियों को चटखारे ले-लेकर पाठकों और दर्शकों को परोसते रहें।
          उनके तर्क हैं कि आज का पाठक और दर्शक यही कुछ देखना चाहता है। फिर वह पाठक कौन है जो फेशबुक, ब्लॉग और अन्य सोशल साइट्स पर इस सबके खिलाफ आक्रामक है ? आज का पाठक वर्ग पहले से अधिक विवेकशील है, वह कल्पनालोक में जीना भी चाहता। यही वह वज़ह है कि दो दशक पूर्व जिन सिनेमा हालों की टिकट खिड़की पर दर्शकों की गहमागहमी के कारण पुलिस को लाठियां भांजनी पड़ती थी, उन्हें दर्शक नहीं मिल रहे तो वहाँ मल्टीप्लेक्स विकसित किये जा रहें हैं। इस सच से बेखबर नहीं है मीडिया लेकिन मानने को तैयार नहीं।
            कारपोरेट हांथों में मीडिया के जो भी माध्यम हैं उनके लिए देश का आम आदमी महज एक ग्राहक है, बाज़ार है। उनका ईमान बाजार है, उनकी संवेदना को उनके गुरूर और अहंकार ने जाने कब निगल लिया था। उनकी समझ तिकड़म में बदल चुकी है और जनसरोकारों की जगह वे सनसनी बेंच रहे हैं तो आप उनसे सच की, समाचारों के स्तर की और सामाजिक सरोकारों की उपेक्षा कैसे कर सकते हैं ? पाठक और प्रसार संख्या के फर्जी आंकड़े प्रसारित कर खुद के सबसे बेहतर और सबसे आगे कहना अलग बात है और होना अलग बात, एक नंबर, दो नंबर, तीन-चार वाले नम्बरदार मीडिया को भले ही यह अभी अहसास न हो लेकिन उनकी मानसिकता, कार्यप्रणाली और सच छिपाने की प्रवृत्ति के खिलाफ समाज में व्यापक विरोध दिख रहा है और कई बार उनके उन संवाददाताओं को अभ्रद्ता के रूप में सहना पडा है जो अपने अखबार की नीतियों के प्रति जिम्मेदार ही नहीं हैं। जो जिम्मेदार हैं वो अपने वातानुकूलित दफ्तरों में खुद को सुरक्षित महसूस भले ही करते हों लेकिन जब जनता का आक्रोश मुखर होता है तो फिर कोई सुरक्षित नहीं रह पाटा। क्या कभी समझेगा कारपोरेट मीडिया इस सच्चाई को ?