Followers

Monday, 21 May 2012

मतदाता , मालिक या माली ?

" लोकतंत्र में शासन सत्ता के तुम ही निर्माता हो , अपने भाग्य विधाता हो " यह गीत
 रेडियो समाचार प्रसारित होने से पूर्व उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावके प्रथम मतदान 
के दिन प्रसारित हो रहा था  , तो अचानक यह विचार आया कि क्या भारत का मतदाता 
वास्तव में भारत के लोकतंत्र की शासन सत्ता का निर्माता है ? मन में इस प्रश्न के कौंधते
ही कई अन्य सवाल भी मेरे सामने इस शासन सत्ता के निर्माता को लगभग धकियाते ,
 धमकाते हुए आ खड़े हुए , मानो कह रहे हों , उसकी ( मतदाता की ) ज़रुरत बस 
मतदान के समय है ,न उससे पहले और न उसके बाद , इसलिए बेवजह उसका कद 
बढाने में माथापच्ची मत कीजिये / अरे हम हैं न -
   पहले सवाल पर नज़र डाली तो यह वही था जो अन्ना के आन्दोलन के समय उन्हें धमाका 
रहा था , यह कहते हुए कि मैं देश में सबसे बड़ा हूँ / मैं क़ानून बनाता हूँ , देश को अपनी
 लाठी से हांकता हूँ , अपराधी को न्याय और जांच की कुर्सी पर बिठा सकता हूँ , आप मेरी 
और उंगली नहीं उठा सकते / आप मेरी अवमानना नहीं कर सकते , आप क्या, देश में 
कोई भी मेरा अपमान नहीं कर सकता क्योंकि मैं सर्वशक्तिमान हूँ , मैं संसद हूँ /
      दूसरा सवाल वह था  जब प्रधानमंत्री ने सर्वोच्च अदालत की कई तीखी टिप्पणियों से 
आहात होकर न्यायपालिका को सीमा में रहने की सलाह दे डाली थी / यानी कि प्रधानमंत्री
 ने परोक्ष रूप में कहा था कि न्यायपालिका सरकार से बड़ी  नहीं है / अगर सरकार में शामिल 
 चेहरों में से आये दिन भ्रष्टों और उठाईगीरों के चहरे प्रकट हो रहे हों , वे जेल भेजे जा रहे हों ,
तो भी सरकार सर्वोपरि और न्यायपालिका को उस पर उंगली उठाने का अधिकार न दिया जाए ,
तो स्वंतत्र न्यायपालिका का क्या अर्थ है ? जब भ्रष्टाचार के खिलाफ सारा देश आंदोलित था तो 
सरकार के कई चाटुकारों ने कहा था कि बाबा रामदेव और अन्ना पहले चुनाव जीतकर आयें ,
फिर क़ानून बनाने की बात करें , और जवाब में इंटरनेट की सैकड़ों सोशल साइट्स पर लाखों तीखी प्रतिक्रियाएं उभरीं , जिनमें 
यह भी पूछा गया था कि प्रधानमंत्री को किस निर्वाचन क्षेत्र की जनता ने चुना है ? जवाब तो 
खैर कोई क्या देता लेकिन शायद उसी समय से इंटरनेट की सोशल साइट्स के खिलाफ सरकार 
की त्यौरियां तन गयीं /आनन् - फानन ऐसी साइट्स के भारत स्थित करता- धर्ताओं को बुलाकर धमकाया गया / वह सब
 आज भी जारी है/
      तीसरा सवाल था वह जिसने राष्ट्रमंडल खेलों में तिकड़म का खेल खेलकर अपनी तिजोरियां
बहरीन थीं / सब कुछ साफ़ था लेकिन अखबारों और मीडिया चैनलों के खुलासे के बाद भी सरकार
 कान  में तेल डाले मूकदर्शक बनी रही / भाई - भतीजों की तिजोरियां भर गयीं , जनता के धन की 
खुली लूट का खेल तिकदामाबाजों ने खेला और जनता बेबस / लोकतंत्र की शासन सत्ता
का यह कैसा निर्माता है जो अपने द्वारा ही ऊंची कुर्सियों पर बिठाए गए  लोगों द्वारा अनवरत छाला
जाता है ? 
      और चौथा सवाल यह था जिसमें वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री ने आम 
जनता से वादा किया था कि उनकी सरकार बनाने के महज़ सौ दिनों के अन्दर विदेशी बैंकों  में जमा 
भारत का काला धन वापस ले आया जायेगा / सौ दिन क्या अब तो ग्यारह सौ दिन बीत चुकेहैं/ जिनके 
बारे में स्विस बैंक ने खुद जानकारी दी , सरकार उनके नाम भी सार्वजनिक करने को राजी नहीं थी / 
एक लंगोटीधारी ने हुंकार भरी , देश भर में अलख जगाई और जब सरकार की नाक  के नीचे दिल्ली के
 रामलीला मैदान में अपने हज़ारों समर्थकों के साथ जा  धमका , तो सरकार ने
 रात के  समय सोते हुए सत्याग्रिहियों पर लाठियां चलवाकर अपनी दिखाई / 40,000  लोगों की भीड़ 
थी और उनमें से सब के सब मतदाता थे,अर्थात संवैधानिक व्याख्या के अनुसार लोकतंत्र की शासन 
सत्ता के निर्माता, फिर बड़ा कौन है ?
          पाचवां ताजा सवाल, जिसमें एक छोटी सी लिपिकीय गलती का सहारा लेकर सरकार , सेना 
के मेजर जनरल को समय से एक वर्ष पूर्व सेवानिवृत करने पर आमादा थी / एक अजीब  सा तमाशा 
, पड़ोसी देश पाकिस्तान में सेना , सरकार की उम्र तय करती है और हम चूंकि लोकतंत्र के झंडाबरदार 
हैं  , इसलिए यहाँ सरकार तय कर रही है सेना की उम्र / वजह यह कि सरकार किसी अपने कृपापात्र 
को सेना के  पद पर बिठाना चाह  रही थी सो सेना के मेजर जनरल को समय से एक वर्ष पूर्व ही बेदखल करने पर आमादा थी / 
      सवाल तो और भी ढेर सारे थे , लेकिन अपने बेचारे मतदाता अर्थात लोकतंत्र की शासन सत्ता के
 निर्माता को इन दबंग सवालों द्वारा बार - बार धकियाये जाते देख , मेरे मन में उसके प्रति सहानुभूति 
जगी और मैं उसे एकांत में लेजाकर समझाना चाह रहा था कि तुम वास्तव में निर्माता तो हो लेकिन ऐसे 
निर्माता , जिससे बिना पारिश्रमिक काम लिया जाता है / फिर निर्माता तो बनाता है , वह उसका सुख 
कहाँ भोगता है / बड़े - बड़े शहरों  की छातियों पर खडी  गगनचुम्बी इमारतों को देखो / इन्हें मज़दूरों ने अपने सर पर ईट - गारा ढोकर बनाया है , कारीगरों ने भी तपती धुप में अपना पसीना
बहाया है , उनहोंने तामीर की है लेकिन वे उनमें रह नहीं सकते / सडकों को बनते हुए देखो , इन्हें बनाने वाले
मज़दूर बाद में  उन सडकों की फुटपाथ पर भी तो चलने नहीं दिए जाते / तुम वही हो , लोकतंत्र के निर्माता ,
के भाग्य विधाता , लेकिन तुम भारत नहीं हो / तुम   हिन्दू हो , मुसलमान हो , दलित हो , अगड़े हो , पिछड़े 
हो / तुम महज वोट हो और वोट के अतिरिक्त कुछ भी नहीं / तुम भारत नामक खुशनुमा बगीचे के पौधे निरा सकते हो , उन्हें खाद - पानी दे सकते हो , उन पर फल और फूल खिला सकते हो , लेकिन उनका उपयोग नहीं 
कर सकते / उपयोग और उपभोग वे करेंगे जिन्हें तुम मालिक बनाते हो , मालिक समझते हो / तुम केवल माली हो और तुम्हें माली तथा मालिक के बीच का अंतर समझना चाहिए /
                                                         
                                                                                   - एस . एन . शुक्ल 
      
  

3 comments:

  1. मतदाता दाता नहीं, केवल एक प्रपंच |
    एक दिवस के वास्ते, मस्का मारे मंच |


    मस्का मारे मंच, महा-मुश्किल में *मालू |
    इसका क्या विश्वास, बिना जड़ का अति-चालू |


    माली बनकर छले, खले मालिक मदमाता |
    मालू जाय सुखाय, मिटे मर मर मतदाता ||
    *लता

    ReplyDelete
  2. आमंत्रित सादर करे, मित्रों चर्चा मंच |

    करे निवेदन आपसे, समय दीजिये रंच ||

    --

    बुधवारीय चर्चा मंच |

    ReplyDelete
  3. आप ने आकर बुधवारीय चर्चा मंच की शोभा बधाई ।

    आभार ।।

    ReplyDelete