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Friday, 25 May 2012

मज़दूर की व्यथा

मज़दूर की व्यथा

मैं मज़दूर , मुझे देवों की बस्ती से क्या /
मैनें अगणित बार धरा पर स्वर्ग बसाए /
   इस पंक्ति के साथ मैं कुछ कहना चाहता हूँ, अपने उन लोगों के बारे में जिन्हें दुनिया के बड़े लोग 
मज़दूर, मज़लूम, मज़बूर और कमजोर न जाने क्या-क्या कहकर पुकारते हैं / वे आर्थिक दृष्टि से 
कमजोर हैं और वह भी तब, जबकि वे सबसे अधिक मेहनत करते हैं / सवाल यह है कि उनकी दशा में सुधार कैसे हो ? इनकी दयनीय दशा को लेकर देश में बड़े-बड़े सेमीनार आयोजित 
होते हैं , विचार और भाषण, लेकिन देश की आज़ादी के 65 वर्षों बाद भी वे जहां थे, अब भी वहीं हैं /
उनकी दशा, उनकी आर्थिक और सामजिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं /  सुधार के बजाय  उनकी 
हालत और भी दयनीय होती गयी /  मज़दूरों की लड़ाई लड़ते-लड़ते जाने कितने नेता जमीन से 
उठाकर आशामान पर पहुँच गए, देश की राजनीति के शिखर पर पहुँच गए, लेकिन मज़दूर वहीं के 
वहीं हैं, जबकि सभी जानते हैं कि बिना मज़दूरों के कोई भी काम संभव नहीं है / जैसे बिना नीव के
 इमारत नहीं खादी की जा सकती उसी तरह बिना मजदूरों के दुनिया का कोई भी काम नहीं किया 
जा सकता /जिस देश का मजदूर और किसान भूख से मर रहा है वह देश कभी तरक्की नहीं कर
 सकता /देश और प्रदेश  कि सरकार चलाने वाले चंद गलत रिपोर्ट पेश करके जो भी स्थिति को 
दिखावें परन्तु अपने देश में मजदूरों की स्थिति काफी ख़राब है /और ये जो पौष्टिक भोजन की 
बात कर रहें हैं उन्हें क्या पता कि श्रमिक वर्ग को पौष्टिक भोजन तो छोड़ दो पूरे परिवार को रोज 
खाना ही नसीब नहीं हो जाये यही बड़ी बात है/कुछ मजदूरों के परिवार को एक ही समय का अन्न 
नसीब होता है/मेरा तो मनना है कि जब तक मजदूरों के बारे में सरकार सही निर्णय लेकर नीति 
नहीं बनाएगी, तब तक इनकी स्थिति में सुधार होने वाला नहीं और इसमें इमानदारी से कम करने 
की जरूरत है/ एस शेर के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ/
अल्लाह में ग़ुरबत कहीं गुमराह न कर दे /
राजी पे रजा हूँ अभी हर बात बनी है /
                                                                   धनञ्जय शर्मा 

3 comments:

  1. उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...

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  2. बहुत सुन्दर
    समाज का वो वर्ग जो समाज का एक अपरिहार्य अंग है पर उसकी पीड़ा को समझ पाने के लिये फुरसत नहीं है लोगो के पास
    आपने बहुत ही सुन्दर तरीके से उसकी व्यथा का चित्रण किया है

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  3. बहस वाला विषय है पर बहस से भी कुछ नहीं होता है जब तक उनके लिए कुछ किया ना जाए.. केवल आरक्षण देने से समाज सुधार नहीं होता है पर नेताओं का वोट बैंक तो बढ़ ही रहा है..

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