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Friday, 5 October 2012

गांधीजी के सपनों का भारत और वर्त्तमान लोकतंत्र-3

            बाबा- ए - कौम महात्मा गाँधी 


दुनिया की जिन सख्शियतों ने शोहरत की बुलंदियां हासिल कीं उनमें गांधीजी का नाम सबसे अज़ीम है। उनहोंने सारी ज़िंदगी अहिंसा के नाम कर दी , सारी दुनिया को अहिंसा का उपदेश देते रहे और खुद हिंसा का शिकार होकर शहादत पायी। मालदार परिवार के तीन भाइयों में सबसे छूते होने की वजह से उन्हें परिवार का प्यार और परवरिश दोनों ही अच्छी मिलीं। बचपन माँ की परवरिश में ज्यादा गुजरा जो एक धार्मिक महिला थीं। उनसे सूनी सत्यवादी हरिश्चंद्र और श्रवण कुमार की कहानियों का उन पर गहरा असर हुआ और वह उनके साथ सारी ज़िंदगी रहा।
     जाति से वैश्य होने के बावजूद उनके परिवार का माहौल पूरी तरह सामाजिक था। उनके दादा जूनागढ़ रियासत के दीवान थे इसलिए उनके यहाँ लोगों का आना- जाना ज्यादा था जिनमें हिन्दू और मुसलमान सभी होते थे। इसी माहौल ने उन्हें पूरी तरह धर्म निरपेक्ष बनाने में भारी मदद की। देश में अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद वह वकालत की तालीम हासिल करने इंग्लॅण्ड गए और वहां से बैरिस्टर बन कर वापस लौटे। वह चाहते  तो उन्हें कोई बड़ा सरकारी ओहदा भी मिल सकता था या वह खुद वकालत कर शोहरत और पैसा कमा सकते थे लेकिन अंग्रेज सरकार की ज्यादती और जुल्म तथा भारत के लोगों की दीन - हीन दशा ने उन्हें द्रवित किया और उन्होंने हिन्दुस्तान को अंग्रेजों की गुलामी से आज़ाद कराने का फैसला किया। एक हिन्दू पतिवृता औरत की तरह उनकी धर्मपत्नी कस्तूरबा बाई जिन्हें लोग बा के नाम से जानते थे , ने भी गांधीजी को पूरा सहयोग किया और उनकी ताकत बन गयीं।
     हालांकि उस दौर में अंग्रेजों की मुखालफत शुरू हो चुकी थी लेकिन वह विरोध एकजुट नहीं था जिसका फ़ायदा अंग्रेजों को मिल रहा था और वे उन विरोधों का आसानी से दमन कर देते थे। इसकी वजह यह थी की मुखालफत करनेवालों का कोई नेता नहीं था जो उन्हें संगठित कर सके। इसी बीच जलियानवाला हादसा हो गया जिसमें अंग्रेजों ने हैवानियत की हदें पार करते हुए हजारों लोगों को जिनमें बच्चे, बूढ़े और औरतें भी थीं गोलियों से भून डाला। यह कत्लेआम हिन्दुस्तानियों के दिलों में दहशत पैदा करने के लिये किया गया था। जवानों में इस घटना  के खिलाफ गुस्सा था तो आम आदमी में खौफ भी था।उस घटना ने गांधीजी को नयी सोच दी लेकिन सच के लिए उनका फैसला और पक्का हो गया। वह जानते थे कि निहत्थे हिन्दुस्तानी अंग्रेजों की गोलियों से तभी बचाए जा सकते   वे उनका  अहिंसात्मक विरोध करें, उनकी नीतियों का विरोध करें और यह विरोध सारे मुल्क की आवाज़ बन जाय।
    यह वह दौर था जब अंग्रेज हिन्दुस्तान में फिरकापरस्ती के बीज बो चुके थे और हिन्दुओं- मुसलमानों के बीच नफ़रत की खाई चौड़ी होती जा रही थी। उस वक्त मुल्क को एक ऐसे लीडर, एक ऐसे रहनुमा की जरूरत थी जिस पर सब भरोसा कर सकें और जो सबको साथ लेकर चल सके। यह काम केवल वही आदमी कर सकता था जिसमें लालच न हो, सहन करने की ताकत हो, ईमानदारी हो और लीडर बनाने की काबिलियत भी हो। ये सारी खाशियतें गांधीजी में थीं। वह उच्च शिक्षा प्राप्त बैरिस्टर थे, तर्कों से अपनी बात साबित कर सकते और मनवा सकते थे और सबसे बड़ी सच्चाई की ताकत भी उनके साथ थी। जिसके साथ सच्चाई की ताकत होती है उसके साथ सारी कायनात के मालिक यानी कि खुदाई ताकत मानी जाती है। उसी ताकत की बदौलत बिना हथियारों की लड़ाई लड़े उन्होंने अंग्रेजों पर फतह हासिल की, मुल्क को गुलामी से आज़ाद कराया लेकिन वह अपनों से हार गए।
      उनके ज़ज्बे, उनके त्याग को सारे हिन्दुस्तान ने सलाम किया और उन्हें बाबा-ए - कौम ( राष्ट्रपिता ) के खिताब से नवाजा गया। काश, यह मुल्क उनके बताये रास्ते पर चल पाता , काश उनके ख़्वाबों का हिन्दुस्तान हकीकत में बदल पाता , तो यह मुल्क फिर सारी दुनिया का ताज़ होता। हम सवा सौ करोड़ हिन्दुस्तानी सारी दुनिया के सातवें हिस्से से भी ज्यादा हैं, हमारे पास जेहनियत की भी कमी नहीं है, लेकिन जिन हाथों में आज हिन्दुस्तान की बागडोर है उनकी नीयतें साफ़ नहीं हैं। जम्हूरियत से अच्छी कोई हुकूमत नहीं मानी जाती , लेकिन इन दिनों हिन्दुस्तान में जो जम्हूरियत है उससे तो बेहतर किसी तानाशाह की हुकूमत कही जा सकती है। वहाँ केवल एक ही लुटेरा होता है बादशाह, लेकिन इस मुल्क की हुकूमत में शायद हर कुर्सी लूट के लिए ही बनायी गयी है।बापू नहीं हैं लेकिन यह सब देखकर उनकी रूह को तकलीफ तो होती ही होगी। काश! हम इतना एहसानफरामोश न होते।
          - समीना फिरदौस 

गांधीजी के सपनों का भारत और वर्तमान लोकतंत्र - 2

      नेताओं ने बेच दिया ईमान को 

                 
     
      जिनका ईमान ही बिक गया हो , वे क्या नहीं बेच सकते।जिनकी बदौलत देश को आज़ादी मिली, वे सौदागर नहीं थे। उन्हें आज़ादी की लड़ाई के बदले कुछ चाहिए भी नहीं था, लेकिन सियासी नेताओं की जात और जमात ने कुछ दिनों तक उन आज़ादी के दीवानों की कुर्बानियों को बेचा , फिर उनके नाम को बेचा और अब मुल्क को बेच रहे हैं। इस मुल्क में अंग्रेजों को पैर जमाने का मौक़ा तब मिला था  जब मुल्क के हुक्मरान ऐयाशियों में डूबे थे। आज हालात फिर वही हैं , रोज ही सियासताबाजों की, नौकरशाहों की रंगरेलियों की नयी- नयी कहानियां सामने आ रही हैं। जो खुद अपनी नीयत नहीं संभाल सकते वे मुल्क संभाल रहे हैं तो मुल्क के जैसे हालात होने चाहिए वैसे ही हो रहे हैं। हुक्मरानों ने खुद को विदेशी हाथों में गिरवी रख दिया है , देश और देशवासियों का सौदा तय हो चुका है। यह जो ऍफ़ डी आई का शोर सुनायी दे रहा है, वह देश के खुदरा बाज़ार पर विदेशी कब्ज़ा कराने की देशी साजिश है। जब सारी दुनिया आर्थिक मंदी के दौर से गुज़र रही थी , तब भी इस मुल्क में आर्थिक मंदी नहीं आयी जैसी कि अमरीका आदि मुल्कों में आयी थी। इसकी वजह यह थी कि यहाँ पूंजी का बहाव थमा नहीं था। हर चौराहे और नुक्कड़ पर, हर गली और मोहल्ले में छोटी- छोटी दुकानें और सुबह से लेकर शाम तक छोटी- छोटी जरूरत की चीजों की लगातार खुदरा बिक्री ने ही इस मुल्क को आर्थिक मंदी से बचाए रखा था।
      अब अगर विदेशी पूंजी देश के बाज़ारों पर काबिज होगी तो उनके बड़े- बड़े शापिंग माल खुलेंगे। चूंकि देश के हुक्मरान इस मुल्क के खुदरा व्यापार का विदेशी हाथों सौदा कर चुके हैं, इसलिए उनके हितों के लिए वे गली- मुहल्लों, नुक्कड़ और चौराहों की फुटकर और छोटी- छोटी दुकानों का धंधा बंद करा देंगे। तब बेरोजगारी और बढ़ेगी। वही ईस्ट इंडिया कंपनी का दौर एक बार फिर देश में दस्तक दे रहा है। तब एक मुल्क की एक कंपनी आयी थी , अब कितने मुल्कों की कितनी कम्पनियां आयेंगी इसका शुमार नहीं है। 
      हमारा ही पानी हमारे ही हाथों बंद बोतलों में बेचा जा रहा है 15 रुपये बोतल। जो मुफ्त मिला करता था क्योंकि वह अपना था , वही अब महंगे दामों पर खरीदना पड़ रहा है। पैसा विदेश जा रहा है क्योंकि बोतलबंद पानी बेचने वाली ज्यादातर कम्पनियां दूसरे मुल्कों की हैं। हमारे साथ क्या हो रहा है , इसे हम समझना नहीं चाहते। यह शुरुआत थी , कल जब और सारी चीजें भी ऐसे ही बिकेंगी तो हम और भी, इससे भी ज्यादा मजबूर होंगे। 
    गांधीजी के ख़्वाबों के हिन्दुस्तान में मुल्क की सत्तर फीसदी आबादी थी , उसकी खुशहाली के तरीके थे। गावों में रोजगार पैदा करने के तरीके थे, खेती करने वाले किसान थे, मज़दूर थे और मेहनतकश थे। अब वे वोट देने की मशीन बना दिए गए हैं। हर चुनाव में सियासतबाज उन्हें नए ख्वाब दिखाते हैं , वोट बटोरते हैं और अगले चुनाव तक के लिए उन्हें खुदा के भरोसे छोड़ कर अपनी तिकड़मों में लग जाते हैं। हर रोज एक नए घोटाले की खबर सामने आती है और वह घोटाला लाखों का नहीं , कभी करोड़ों का होता है , कभी अरबों का और कभी लाखों करोड़ का। ऐसे घोटालों के खिलाफ उठाने वाली सियासी आवाजें भी ईमानदार नहीं होतीं। जिनके हाथ में हुकूमत होती है वे लूटते हैं , जो मुखालिफ दल होते हैं वे इसलिए चिल्लाते हैं कि उन्हें नहीं मिला। आज देश में कोई ऐसी सियासी पार्टी नहीं बची जो सत्ता में पहुँची हो और उसके नाम मुल्क के लूट की हिस्सेदारी न दर्ज हो। 
     हर सियासताबाज अपने लिए मौक़ा चाहता है। मौक़ा नहीं मिलता तभी तक वह ईमानदार है। लूट के तरीके वे बताते हैं जो नौकरशाह हैं। सारे कुएं में ही भांग है और हमाम में सभी नंगे हैं। जब भ्रष्टाचार का विरोध होता है तो अवाम में उम्मीद जगती है। लोग उसके साथ जुटाने लगते हैं, खड़े होने लगते हैं लेकिन चाँद रोज बाद ही उनकी हकीकत भी सामने आ जाती है। अन्ना आन्दोलन में मेरी भी दिलचस्पी बढ़ी थी, लेकिन दूध का जला मट्ठा  भी फूंककर पीता है। हम इससे पहले के कई ऐसे आन्दोलन देख चुके हैं। उनका हस्र भी देख चुके हैं और जो विरोध कर रहे थे उनके दामन भी दागदार होते देख चुके हैं। हमारे पास भी लोग आते हैं , सबको और सबकी असलियत को समझ पाना भी आसान नहीं है, यही वजह है कि  किसी के साथ खड़े होने में भी कई बार सोचना पड़ता है। जो चहरे पर दिख रहा है वही दिल में भी है यह समझना और जान पाना आसान नहीं है।
      जर्नलिस्ट्स , मीडिया एंड रायटर्स वेलफेयर एसोसिएशन की और से जब उसके प्रोग्रामों में शिरकत की बात की गयी और उसका जो भी साहित्य मेरे सामने आया , उससे मुझे तसल्ली हुयी कि ये लोग वास्तव में मुल्क और अवाम की बहतरी के लिए आवाज उठा रहे हैं। मैं हर अच्छे काम में साथ हूँ और जहां यह मीडिया तंजीम मुझे बुलाना चाहेगी मैं हाज़िर होऊँगा। और भी लोगों को मुल्क और अवाम की हमदर्दी है , कुछ करने की चाहत है। आप कुछ अच्छा करने के लिए एक कदम बढ़ाएं , लाखों लोग आपका साथ देंगे , बशर्ते आप सच्चाई के साथ सच्चाई के लिए लड़ रहे हों।

                          - मौ .अबुल इरफ़ान मियाँ फिरंगीमहली

Thursday, 4 October 2012

गांधीजी के सपनों का भारत और वर्तमान लोकतंत्र -1

देश ही नहीं, दुनिया के लिए प्रासंगिक हैं गांधी 

                                         - विजय कुमार सिंह 
                                 गांधीजी  व्यक्ति  ही  नहीं   विचार  थे , और विचार कभी मरते नहीं। विचारों को सीमाओं में भी नहीं बाँधा जा सकता , इसलिए गांधीवाद और गांधी दर्शन भी सीमाओं से परे है। कोई मनीषी कभी नहीं मरता और इसका इससे बड़ा दूसरा प्रमाण क्या हो सकता है कि किसी भी रचनाकार, लेखक और विचारक के मृत्योपरांत भी उसके नाम के साथ स्वर्गीय  का प्रयोग कभी नहीं किया जाता।वह अपने सृजन, अपने विचारों में जन- जन के बीच सदैव जीवित रहता है। फिर भी रचनाकारों की सीमाएं होती हैं , वे जिस भाषा में भी सृजन करते हैं उस भाषा का ज्ञान रखने वालों के बीच ही उनके विचारों का आलोक रह पाता है , और कभी किन्हीं उत्कृष्ट रचनाओं के भाषानुवाद प्रकाशित होने पर ही वह दूसरी भाषाओं  के जानकारों तक पहुँच पाता  है।किन्तु गांधीजी के लिए जाति , धर्म,सम्प्रदाय, भाषा  या देश ऐसी छोटी सीमाएं हैं जिनमें उनके विराट स्वरुप का समा पाना ही संभव ही नहीं है। 
       अभी हाल ही में अमरीकी राष्ट्रपति  बराक ओबामा ने सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया कि गांधीजी का दर्शन सारी दुनिया के लिए प्रेरक है। वह स्वयं अपने आप को गांधीजी का अनुगामी कहते हैं, लेकिन दुर्भाग्य यह कि गांधी जहां पैदा हुए , जिस राष्ट्र की स्वाधीनता के लिए आजीवन संघर्षरत रहे , जिस राष्ट्र और समाज के उत्कर्ष के लिए अपने सम्पूर्ण भौतिक सुखों का परित्याग कर दिया , उस भारतवर्ष में ही न केवल उनकी ह्त्या हुयी , वरन उनके बाद उन्हीं के नाम पर राजनीति करनेवालों, उनके नाम का सहारा लेकर सत्ता की सीढ़ियाँ तय करने वालों ने लगातार गांधीजी के सिद्धांतों, विचारों और उनकी उन्नत भारत की परिकल्पनाओं की हत्याएं की हैं। आज सारा देश हिंसा, अपराध, व्यभिचार, झूठ, पाखण्ड, भ्रष्टाचार और अनैतिकता से त्रस्त है और सच यह है कि इन समस्याओं से मुक्ति पाए बिना भारत के लोकतंत्रात्मक स्वरुप को सुरक्षित बनाए रख पाना संभव भी नहीं है। समाधान का उपाय केवल और केवल गांधीवाद है, इसलिए स्वाधीनता के पैंसठ वर्ष बाद इस देश के लिए गाँधीजी पुनः अनिवार्य रूप से प्रासंगिक हो उठे हैं। आवश्यक यह है कि इस दिशा में जागरुक जनता हो, देश हो , क्योंकि स्वार्थ में डूबे सत्ताधारियों और सत्ता प्राप्त करने के लिए साजिशें कर रहे राजनैतिक तंत्र से अपेक्षाएं करना बेमानी है।
     इस दिशा में पहल होती दिख रही है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के गाँधी भवन स्थित करन भाई सभागार में गांधी जयन्ती की पूर्व संध्या पर आज पहली अक्टूबर को " पत्रकारों, वेब एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया प्रतिनिधियों तथा कलमकारों के राष्ट्रीय साझा मंच " जर्नलिस्ट्स , मीडिया एंड रायटर्स वेलफेयर एसोसिएशन " द्वारा आयोजित सेमीनार " गाँधीजी के सपनों का भारत और वर्त्तमान लोकतंत्र " का आशय और विषयवस्तु  उसी पहल का प्रारम्भिक चरण माना जा सकता है। सामाजिक सरोकारों के प्रति किन्हीं अन्य की अपेक्षा मीडिया की प्रतिबद्धता कहीं अधिक है। मीडिया लोकतंत्र का सजग और जागरुक प्रहरी माना जाता है तो अघोषित चौथा स्तंभ भी। वह सचेतक भी है और मार्गदर्शक भी। समाज को सचेत करने और दायित्वों तथा अधिकारों के प्रति जागरुक करने की जिम्मेदारी भी मीडिया के ही कन्धों पर ही है। कभी हम और हमारा सोच भी गलत हो सकता है इसलिए जब मसले गंभीर हों तो मीडिया उन मसलों पर विचारकों और बुद्धिजीवियों की राय भी आमंत्रित करता रहा है।
       कालान्तर में यह परम्परा समाप्त सी होने लगी थी और उसी का परिणाम है कि राजनीति और सत्ता , प्रतिभाओं की बजाय तिकड़मी, अवसरवादी, भ्रष्ट और बेईमान लोगों के हाथों में चली गयी। ऐसे जनजागरण वाले मुद्दों पर होने वाले सेमीनार और विचार गोष्ठियों का निष्कर्ष  केवल समाचारों तक सीमित न रहकर आम पाठकों तथा जनता तक भी पहुँचना चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र की मजबूती और स्वस्थ जनतंत्र की पहली शर्त यही है कि बुद्धिजीवियों की सूनी जाय और उस पर अमल भी किया जाय। चूंकि समाचारों पर अब शासन और प्रशासन भी वह तत्परता नहीं दिखाता जो आज से दो- तीन दशक पहले तक दिखती थी , इसलिए भी आवश्यक हो गया है कि जनसमस्याओं और जनहित के मुद्दों को सार्वजनिक मंच पर अभिव्यक्ति मिले और उनमें जन साधारण की भागीदारी के लिए मीडिया पहल करे।
      हम कारपोरेट घरानों और उद्द्यमियों के हाथों बंधक मीडिया से यह अपेक्षा नहीं कर सकते क्योंकि वे शुद्ध रूप से व्यवसायी हैं जो सबसे पहले अपना आर्थिक हित देखते हैं। आज का स्वतंत्र और वास्तविक मीडिया तंत्र वही है जो लघु और मध्यम समाचार माध्यमों की श्रेणी में गिना जाता है। हम जन सरोकारों को सार्वजनिक मंच प्रदान करने के लिए संगठन के प्रयास को एक बार पुनः साधुवाद देते हैं और " लोकसेवा ब्यूरो " के इस अंक में संगठन द्वारा आयोजित गोष्ठी " गांधीजी के सपनों का भारत और वर्त्तमान लोकतंत्र " विषय के विचारों को विशेष सामग्री के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। हमें अपने सुधी पाठकों से भी इस सन्दर्भ में प्रतिक्रियाओं की अपेक्षा है।
       -  विजय कुमार सिंह 

Sunday, 16 September 2012

लोकतंत्र, मीडिया और मुसलमान -4

    " मुसलमानों की देशभक्ति पर कोई संदेह नहीं "


       आतंकी नेटवर्क भारत के बाहर से संचालित हो रहा है , हम उसका खामियाजा भुगत रहे हैं और दुर्भाग्य से  लालच या नासमझी में हमारे अपने देश के कुछ लोग भी उस आतंकी नेटवर्क के हाथों खेल रहे हैं। ऐसे लोग किसी सम्प्रदाय विशेष के ही नहीं हैं , वे हिन्दू भी हो सकते हैं, मुसलमान भी, सिख भी और ईसाई भी, लेकिन चूंकि भारत में आतंकी वारदातों को अंजाम देने में पड़ोसी देश पाकिस्तान की भूमिका स्पष्ट हो चुकी है जोकि एक मुस्लिम राष्ट्र है और भारत से ही अलग होकर बना है , इसलिए जब भारत में कोई ऐसी घटना होती है तो सबसे पहले मुस्लिम समुदाय को ही संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगता है। यह पूर्वागृह है जिसके कारण कई बार असली गुनाहगार बच निकालने में कामयाब रहते हैं , तो जो बेगुनाह पुलिस और कानूनी प्रताड़ना का शिकार बनाते हैं उनमें विद्रोह और आक्रोश पनपने लगता है। ऐसे आक्रोश को देशद्रोह का नाम दिया जाना उचित नहीं कहा जा सकता।
     ध्यान देने की बात है कि जब स्वाधीनता से पूर्व देश का बटवारा हुआ था और भारत , हिन्दुस्तान तथा पाकिस्तान दो टुकड़ों में बाता जा रहा था , उस समय भारत के मुसलमानों के सामने खुला विकल्प था कि वे चाहें तो भारत में रहें और न चाहें तो पाकिस्तान चले जाएँ। जो भारत को छोड़कर चले गए वे अपने नहीं थे और उनसे यह देश अपने प्रति किसी निष्ठा की अपेक्षा भी नहीं करता , लेकिन जिन मुसलमानों ने विकल्प मौजूद होने के बावजूद इस देश को, अपने मादरे वतन को छोड़कर जाना मंजूर  नहीं किया , उनकी इस देश के प्रति निष्ठा को संदेह की दृष्टि से कैसे देखा जा सकता है ? आज पकिस्तान की स्थिति क्या है अथवा भारत से पाकिस्तान गए मुसलमानों की वहां हैसियत क्या है , यह एक अलग प्रश्न है लेकिन जो बटवारे के समय दिखाए गए सपनों और सब्जबागों से प्रभावित हुए बिना इस देश की मिट्टी के प्रति अपने प्यार को छोड़ नहीं पाए उनकी इस देश के प्रति निष्ठा निर्विवाद है। 
     आज हमारे अपने ही बच्चे व्यावसायिक शिक्षा की डिग्रियां हासिल कर , अपने माँ - बाप, अपने देश को छोड़कर कैरियर के नाम पर , अपने सुखी भविष्य की उम्मीद में निःसंकोच देश छोड़कर जा रहे हैं। दूसरे देशों की नागरिकता हासिल कर प्रवासी भारतीय कहे जाने पर गर्व महसूस करते हैं। उनकी इस देश के प्रति निष्ठा की अपेक्षा तो उन भारतीय मुसलमानों की निष्ठा लाख गुना बेहतर है जो विकल्प के बावजूद भारत में रहे, भारत के रहे। 
      मुस्लिम समाज का एक बड़ा हिस्सा आज भी अशिक्षा के अन्धकार में है। यही तबका मौकापरस्तों और राजनीतिबाजों का सबसे आसान शिकार है। कुर्सियां पाने , सत्ता हथियाने और राजनीति में जगह बनाने के लिए कुछ लोग साजिशें रचाते हैं। गरीब और अशिक्षित तबका ही ऐसे लोगों की साजिश का शिकार बनाता है और उसका खामियाजा समाज को और कई बार तो सारे देश को भुगतना पड़ता है। मुम्बई में मीडिया पर हमला, लखनऊ में अलविदा की नमाज के बाद लाठी- डंडों से लैस मीडिया पर हमला , इस देश के खिलाफ एक सुनियोजित षडयंत्र है। कोई भी नमाजी कभी लाठी- डंडे लेकर नमाज पढ़ने नहीं जाता , फिर उपद्रवियों के हाथों में डंडों का होना क्या यह साबित नहीं करता कि जिन्होंने भी ऐसा किया वे मुसलमान नहीं थे, वे साजिश के तहत मुसलमानों को बदनाम करने आये थे और करीब- करीब अपने मकसद में कामयाब भी रहे। ज़रा गौर करें , दिन भर के रोजे और तपती धूप में क्या रोजेदारों में इतनी ताकत हो सकती है कि वे हमलावर हों और शहर भर में पत्थर बरसाते घूमें ? इसका मतलब साफ़ है कि जिन्होंने भी हमला किया वे नमाजी नहीं थे और वे इस्लाम में आस्था रखने वाले मुसलमान भी नहीं थे। 
       जो भी हुआ , वह दुखद था , लेकिन जरूरी यह है कि उन जड़ों को तलाशा जाए जहां से इन विवादास्पद घटनाक्रमों की शाखाएं फूटीं। प्रहार जड़ों पर ही किया जाना चाहिए , क्योंकि जब तक ऐसे विवादों की जड़ें नहीं ख़त्म की जातीं तब तक वे कभी भी अपने अनुकूल वातावरण पाकर सर उठा सकती हैं। यद्यपि यह कहना आसान नहीं है कि परदे के पीछे साजिशें कौन रच रहा है , लेकिन इतना तय है कि जो कुछ भी हुआ वह साजिशों का ही परिणाम था। चाहे मुम्बई हो या लखनऊ , एक साथ एक बड़ी भीड़ का आक्रामक मुद्रा में निकल आना और हमलावर हो उठना जहां एक ओर साजिश का इशारा करता है वहीं देश के खुफिया तंत्र को चुनौती भी देता है। आखिर हथियारबंद इतनी बड़ी भीड़ कहाँ छुपी बैठी रही कि उसकी भनक सतर्कता एजेंसियों को भी नहीं लग पायी ?
      हम बहस कर सकते हैं लेकिन ऐसी घटनाओं पर विराम लगाने का काम तो शासन और प्रशासन को ही करना है। जरूरी है कि सरकारें ऐसी दुस्साहसिक घटनाओं को चेतावनी और चुनौती के रूप में स्वीकार करें और बिना किसी पक्षपात के उनसे सख्ती से निपटें। इन घटनाओं को हादसा अथवा किसी घटना की प्रतिक्रिया का नाम देकर चुप बैठ जाना भविष्य के किसी बड़े हादसे को आमंत्रित करना है। यदि दोषियों को सजा नहीं दी जाती तो जहां एक और उनके हौसले बढ़ेंगे वहीं उनकी देखादेखी दूसरे उग्रपंथी भी ऐसी हरकतें कर सकते हैं। माओवाद और नाक्सलवाद जैसे उग्रपंथी आन्दोलनों से यह देश पहले ही जूझ रहा है , यदि ऐसी घटनाओं की पुनः आवृति हुयी तो यह कोढ़ में खाज जैसी स्थिति होगी और जिस प्रकार हम पाकिस्तान के आतंरिक वर्ग संघर्ष पर खुश हो रहे हैं , हमें खुद ही वैसी ही विषम परिस्थियों का सामना करना पद सकता है।
     दुर्भाग्य से देश का राजनैतिक तंत्र अपने स्वार्थों के दायरे से बाहर नहीं निकल पा रहा है। विपक्ष सरकार की फजीहत पर खुश होता है कि शायद उसी के बीच से उसे रास्ता मिल जाए और सत्तापक्ष अपने मद में विपक्ष से रचनात्मक सहयोग की अपील भी नहीं करना चाहता। ऐसी परिस्थिति में देश के बुद्धिजीवी वर्ग की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। उन्हें बंद कमरों की बहस से बाहर निकालकर  जागरूकता प्रयास की पहल करनी चाहिए क्योंकि देश को तोड़ने और लोकतंत्र के ताने- बाने को संदिग्ध बनाने की जिस प्रकार की साजिशें हो रही हैं वे भारत के भविष्य के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकती हैं।

                                                                          -    प्रो . रमेश दीक्षित 

लोकतंत्र, मीडिया और मुसलमान -3

                "  सारे विवाद की जड़ सियासत "


     इस देश में प्रायः हर हादसे के पीछे सियासत ही होती है तो हर मांग, हर आन्दोलन और हर सामूहिक विरोध या समर्थन का मकसद भी सियासत से जुदा होता है। दुर्भाग्य यह है कि ऐसे आन्दोलनों, प्रदर्शनों में सबसे ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाने वाले लाभ पाने के मामले में सबसे पीछे रह जाते हैं। यह हमेशा से होता आया है और आज भी हो रहा है। देश भर में जिस तेजी से नए- नए राजनैतिक दलों का उभार हुआ , उसके पीछे सियासत के झंडाबरदारों की अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा थी। उनके जनांदोलनों, प्रदर्शनों में जिन मांगों, जिन अपेक्षाओं को आधार बनाया गया था वे बहुत शीघ्र ही नेपथ्य में चले गए और राजनैतिक मठाधीशों का लक्ष्य महज सत्ता हासिल करना या सत्ता में भागीदारी हासिल करना भर रह गया। राज्यों से लेकर केंद्र तक आज जिस गठबंधन राजनीति का दौर जारी है और जिस प्रकार एक- दूसरे के धुर विरोधी दल स्वार्थों की रोटियाँ सेक रहे हैं उसे देखकर भी यदि आम आदमी को देश की राजनैतिक नीयत समझ में नहीं आती तो यह भारतीय लोकतंत्र के लिए बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है।
        हिन्दुओं के बाद इस देश में सबसे अधिक तादाद मुसलमानों की है। यह इतना बड़ा वोट बैंक है कि वह जिस दल के भी पक्ष में करवट ले ले , उसकी विजय सुनिश्चित हो जाती है, और शायद यही वह लालच है कि देश के प्रायः सारे ही राजनैतिक दल उन्हें अपने पाले में लाने या उनमें बिखराव पैदा करने की रणनीति में जुटे हैं। मुस्लिम तुष्टीकरण के पक्षधर खुद को धर्मनिरपेक्षता का ठेकेदार मानते है और जो इस तुष्टीकरण के पक्ष में नहीं हैं उन्हें साम्प्रदायिक करार देने पर आमादा। सच यह है कि तुष्टीकरण और विरोध दोनों ही गलत रास्ते हैं और इससे देश की सामाजिक समरसता बुरी तरह प्रभावित हो रही है। उदाहरण के तौर पर दिल्ली का बाटला हाउस मुठभेड़ काण्ड लिया जा सकता है, जिसमें कुछ उग्रवादी मुस्लिम युवाओं से मुठभेड़ में दिल्ली पुलिस के एक जांबाज इंस्पेक्टर को अपनी जान गंवानी पडी थी। जाँच एजेंसियों ने भी उस मुठभेड़ की सत्यता के पक्ष में अपनी मुहर लगाई थी और उस मुठभेड़ में शामिल रहे गुमराह मुस्लिम युवाओं को गुनाहगार ठहराया था , लेकिन पिछले वर्षों उक्त मुददे को लेकर जो सियासत होती रही उससे दुखद क्या हो सकता है कि बिना जांच- पड़ताल के ही कोई नेता मुस्लिम वोटों की लालच में मुठभेड़ को ही गलत ठहरा दे और मुठभेड़ में शहीद हुए अपने ही जांबाज इंस्पेक्टर की मौत का मजाक उडाये।
         एक और मसला गुजरात के बहुचर्चित सोहराबुद्दीन की कथित मुठभेड़ में ह्त्या किये जाने का है , जिसको लेकर वर्षों से देश भर की सियासत गर्म है और अखबारों ने उक्त मसाले को लेकर जाने कितने पन्ने काले किये हैं। यह पूरी तरह प्रमाणित है कि सोहराबुद्दीन एक कुख्यात अपराधी था, उसका आतंकी नेटवर्क से गहरा रिश्ता था , वह जघन्य आपराधिक मामले में लम्बे समय तक जेल में भी बंद रहा था और उसके पास से दो दर्जन विदेश निर्मित एके - 47 रायफलें बरामद हुयी थीं। क़ानून की नजर में ऐसे अपराधी की ह्त्या किया जाना भले ही अनुचित हो, लेकिन समाज और देश हित में क्या उसका मारा जाना अपराध था ? यहाँ एक और भी प्रश्न है कि यदि सोहराबुद्दीन जाती से मुसलमान न होता और उसकी फर्जी मुठभेड़ में ह्त्या की गयी होती तो भी क्या देश की सियासत में उक्त मुठभेड़ को लेकर ऐसा ही भूचाल आया होता ? अपराधी केवल अपराधी होता है , उसका कोई धर्म नहीं होता। क़ानून क्या कहता है , यह दीगर बात है लेकिन मेरा अपना नजरिया है कि जो भी देश के खिलाफ आपराधिक गतिविधियों में शामिल हो , उसका केवल एक ही इलाज है सजा- ए - मौत , फिर चाहे वह पुलिस की गोली से हो, लोगों के गुस्से से हो या अदालत के आदेश से।
         देश की व्यवस्था के स्तर पर हिन्दू और मुसलमान की बात बंद होनी चाहिए। विरोध और तुष्टीकरण दोनों ही बंद होने चाहिए। वोटों की लालच की राजनीति का विरोध किया जाना चाहिए और सार्वजनिक योजनायें जाति , धर्म, सम्प्रदाय के हित की बजाय सार्वजनिक हित की बनायी जानी चाहिए, हाँ आर्थिक रूप से कमजोर तबकों को मदद अवश्य की जानी चाहिए। वे जो सत्ता के सौदागर हैं, उन्हें अपने स्वार्थ से आगे कुछ दिखाई नहीं देता, लेकिन अब समय आ गया है कि देश का बुद्धिजीवी वर्ग देश को जगाये और देश की अवाम को समझाये कि उसका कौन लोग और किस प्रकार शोषण कर रहे हैं। कौन लोग उनकी भावनाओं को भड़काकर देश और समाज को तोड़ने की साजिशें रच रहे हैं।
         पराधीनता से देश को मुक्त कराने के लिए स्वाधीनता संघर्ष में जितना योगदान हिन्दुओं का रहा है,उससे कहीं अधिक मुसलमानों का रहा है। फिर देश के बटवारे के समय जो मुसलमान भारत को छोड़कर पाकिस्तान चले गए, उनकी इस देश के प्रति निष्ठा हो भी नहीं सकती लेकिन जिन्होंने भारत को छोड़ना स्वीकार नहीं किया उनकी निष्ठा पर संदेह भी नहीं किया जा सकता। देश के सर्वोच्च अर्थात राष्ट्रपति पद पर डॉ . जाकिर हुसैन, डॉ . फखरुद्दीन अली अहमद और डॉ . ए .पी . जे . अब्दुल कलाम जैसी महान विभूतियाँ आसीन रह चुकी हैं, अर्थात जिनके आलोक में सारे देश की छवि को देखा जाता रहा है। क्या वे किसी वर्ग विशेष के प्रतिनिधि होने के नाते उस ऊँचाई तक पहुंचे ? इस देश को संवारने में सबकी सामान भागीदारी है , इसलिए धर्म और जाति के आधार पर कोई आकलन, कोई तुष्टीकरण उचित नहीं कहा जा सकता।
           सच यह है कि मुस्लिम सम्प्रदाय के खिलाफ साजिशें तो इस देश की सियासत भी करती रही है। उन्हें दीनी तालीम के प्रति परोक्ष रूप से प्रेरित करना और दुनियावी तालीम से महरूम बनाए रखना क्या साजिश नहीं है ? देश का मुस्लिम तबका अब भी अन्य वर्गों की अपेक्षा उस सिक्षा के मामले में बहुत पिछड़ा है जो शिक्षा सामाजिक सोच विक्सित करती है और रोजी - रोटी का जरिया आसान करती है। जो शिक्षित नहीं हैं वे शिक्षा के महत्व को भी आसानी से नहीं समझ सकते कि उनका कौन अपने मकसद के लिए कहाँ और कैसे इश्तेमाल किये ले रहा है। वे आसानी से बरगलाए और बहकाए जा सकते हैं। वे धार्मिक आस्थाओं पर बिना परिणामों की परवाह किये उग्र हो सकते हैं, और गत माह देश के जिन भी हिस्सों में मुसलमान उग्र हुए , वे सारी ही घटनाएँ ऐसी ही सियासती साजिशों की परिणति थीं। गुनाहगार तो वे हैं जो पर्दों के पीछे से अपने स्वार्थों को सिद्ध करने के लिए खेल, खेल रहे हैं। उन्हें बेनकाब किया जाना चाहिए ताकि देश की एकता बरकरार रहे और भारतीय लोकतंत्र की राह बाधित न हो।
                                                            - आर .एस . उपाध्याय
        


लोकतंत्र, मीडिया और मुसलमान -2

                 " हमलों के पीछे सुनियोजित साजिश "

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             स्वाधीन और लोकतांत्रिक भारत का यह इतिहास रहा है कि यहाँ के मीडिया जगत ने समाचारों के मामले में कभी धार्मिक आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया। कालान्तर में कुछ ऐसे समाचार- पत्र प्रकाशित अवश्य हुए जो किसी धर्म या सम्प्रदाय विशेष के प्रति आशक्ति से भरे थे किन्तु उन्हें जनस्वीकार्यता कभी नहीं मिल पायी। वे पानी के बुलबुलों की तरह उठे और खुद ही कालकवलित हो गए, फिर मीडिया की धर्मनिरपेक्षता पर उंगली कैसी उठायी जा सकती है ? अयोध्या की विवादित धार्मिक इमारत, चाहे वह बाबरी मस्जिद रही हो या राम जन्मभूमि, उसे ध्वस्त करने वालों, उपद्रवियों को उकसानेवालों के चहरे मीडिया ने ही बेनकाब किये थे तो अनेकों बार ऐसा भी हुआ है कि सौहार्द के खिलाफ साजिशों को बेनकाब करने में मीडिया ने अहम् भूमिका निभाई है। हम एक बार मीडिया हाउस मालिकों की नीयत पर तो उंगलियाँ उठा सकते हैं लेकिन मीडियाकर्मियों,  समाचार- पत्र  प्रतिनिधियों की  निष्ठा, ईमानदारी और जिम्मेदारियों के प्रति समर्पण पर संदेह नहीं कर सकते। वे घटनाओं और समाचारों का सच अपने प्रकाशनों और प्रसारण  केन्द्रों तक पहुंचाते हैं, लेकिन कई बार वह सच मीडिया हाउस मालिकों के स्वार्थ, उनके व्यावसायिक हितों के कारण समाज तक नहीं पहुँच पाता और यही वह गडबडी है जिसके कारण दोषी न होने के बावजूद मीडियाकर्मियों की ईमानदारी को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा है।
           रमजान के महीने में मुस्लिम समुदाय की जो आक्रामकता मुम्बई में मीडियाकर्मियों के साथ नज़र आयी, उसकी घोर निंदा की जानी चाहिए लेकिन उस आक्रामकता और आक्रोश की जो ध्वनि बाहर आ रही थी उसे भी नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। कहा जा रहा था कि मीडिया मुस्लिम नेताओं और धर्मगुरुओं से जुडी खबरों को तो प्राथमिकता देता है लेकिन मुस्लिम समुदाय की पीड़ाओं, परेशानियों और उनकी समस्याओं को नज़रंदाज करता है। यदि ये आरोप सही हैं तो मीडिया को भी अपनी भूमिका का पुनः आकलन करना चाहिए कि क्या वह अपनी भूमिका के साथ न्याय कर पा रहा है ?अपनी अनदेखी के प्रति किसी समुदाय विशेष का गुस्सा भी स्वाभाविक है , लेकिन लोकतंत्र में विरोध का तरीका भी लोकतांत्रिक होना चाहिए। अपनी बात कहने के लिए हिंसा को माध्यम बनाने वालों की बात शायद ही कोई सुनाने को तैयार होगा। यदि मुम्बई में और फिर बाद में उसी तर्ज पर लखनऊ में मीडिया पर हमले आम मुसलमानों की उपेक्षा के कारण मुसलमानों द्वारा ही किये गए हों , तो क्या उससे मीडिया उन्हें महत्व देने लगेगा ? निश्चित है कि ऐसा नहीं होगा। किसी पर हमला करके आप हमेशा के लिए उसकी अपने प्रति हमदर्दी को गँवा देंगे। यह बात आम मुसलमान भी समझता है , इसलिए उक्त दोनों ही शहरों में मीडिया पर हुए हमलों में आम मुसलमान की भूमिका किसी तौर पर भी समझ से परे है।
          हमले हुए हैं, हमले करने वाले लोग भी मुस्लिम समुदाय के थे, लेकिन वे मुसलमान नहीं थे। अलविदा की नमाज केवल अपनी सलामती के लिए नहीं , सारी कायनात की सलामती और खुशहाली के लिए अदा की जाती है। हर नमाजी शायद अलविदा के दिन ऐसी दुआ मांगता भी है, फिर वह उसी समय कोई मारपीट, कोई हमला क्यों और कैसे कर सकता है ? इसका सीधा सा मतलब निकलता है कि मीडिया पर हमला करनेवाले लोग  किराए  के   गुंडे थे और जो कुछ भी हुआ वह एक सुनियोजित साजिश के तहत हुआ। साजिश क्यों रची गयी, साजिश को अंजाम देने के लिए वही वक्त क्यों मुक़र्रर किया गया, जब मस्जिदों में नमाज़ पढ़कर भारी संख्या में मुसलमान बाहर निकल रहे थे ?
           इन सवालों के जवाब खोजना कठिन नहीं है। यह साजिश शायद मीडिया को मुसलमानों का दुश्मन बनाने के लिए रची गयी, ताकि नाराजगी में मीडिया के लोग एक समूचे सम्प्रदाय की ही उपेक्षा करने लगें। नमाज़ के ठीक बाद का वक्त शायद हमले के लिए इसलिए भी तय किया गया होगा, कि हमलावरों के पहनावे को देखकर लोगों में उनके मुसलमान होने का भ्रम पैदा हो और पुलिस तथा प्रशासन का दबाव बढ़ने पर हमलावर आसानी से अपने को नमाजियो की भीड़ ं के बीच छिपा सकें। शायद साजिशकर्ताओं को पूरी तरह यकीन रहा होगा कि साम्प्रदायिक तनाव बढ़ने के भय से पुलिस और प्रशासन हमलावरों पर बल प्रयोग करने और उन्हें पकड़ने से गुरेज़ करेगा। यह भारतीय लोकतंत्र की राजनैतिक विवशता रही है कि प्रशासन साम्प्रदायिक माहौल बिगड़ने के भय से कई बार खून के घूँट निगलने को विवश हुआ है। ऐसा ही बाबरी ध्वंश के समय भी हुआ था और वही मुम्बई तथा लखनऊ में मीडिया पर हमले के समय भी हुआ। साजिशकर्ताओं ने देश की व्यस्थागत कमजोरी का फ़ायदा उठाया और सम्प्रदाय विशेष तथा मीडिया के बीच नाइत्तिफ़ाकी पैदा करने में बहुत हद तक फौरी तौर पर ही सही, कामयाब भी रहे।
        एक बात और भी गौर करने की है कि मुम्बई और लखनऊ दोनों ही शहरों में मीडिया पर हमले रमजान के पाक महीने में और आम मुसलमान के रोजों के दौरान  हुए। रोज़ेदार रोजा रखते हुए लार निगलना, झूठ बोलना और किसी के लिए अपशब्दों का प्रयोग करना भी गुनाह सामझता ह, तो वह उस दौरान मारपीट, तोड़-फोड़ करके रोज़े के शबाब का हकदार कैसे हो सकता है ? यह बात तो एक गैर पढ़ा- लिखा और जाहिल मुसलमान भी समझता और मानता है, फिर ऐसी घटनाओं में आम मुसलमानों की भागीदारी क्या संदेहास्पद नहीं मानी जानी चाहिए ?
           भारतीय लोकतंत्र में भारत के मुसलमानों को पूरी तरह यकीन है और वे जानते हैं कि इस देश में उनके हक़ को कोई खतरा भी नहीं है। जहाँ तक सवाल मीडिया का है तो मीडिया किसी धर्म, मज़हब, फिरके या सम्प्रदाय विशेष की नुमाइंदगी नहीं करता। मीडिया आम आदमी के हितों की हिफाजत के लिए है, उनके अधिकारों की रक्षा के लिए पूरी तरह समर्पित भी है और उस आम तबके में सभी धर्म, सम्प्रदाय तथा जातियाँ शामिल हैं। जिन पर हमले हुए उनमें मुस्लिम सम्प्रदाय के मीडियाकर्मी भी थे और वे बख्शे भी नहीं गए, फिर वे हमलावर कैसे मुसलमान थे जिन्होंने नमाज़ अदा करने के बाद अपनी ही बिरादरी के लोगों से मारपीट की ? इसका सीधा सा अर्थ है कि जो कुछ भी हुआ, वह साजिश का परिणाम था और ऐसी साजिशों के खिलाफ भारतीय लोकतंत्र के जिम्मेदार लोगों, बुद्धिजीवियों ,मीडियाकर्मियों   ,  आम मुसलमानों और देश की अवाम     को एक  होना   ही होगा।ै
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लोकतंत्र , मीडिया और मुसलमान -1

                           बुद्धिजीवी आगे आयें 

  शरीर का संचालन और नियंत्रण मस्तिष्क करता है। किसी उद्यम , योजना, कारखाने का नियंत्रण, प्रबंधन और संचालन उसके प्रबंधक द्वारा किया जाता है अर्थात उनका मस्तिष्क प्रबंधन में स्थापित होता है। तब समाज और देश का नियंत्रण और संचालन किनके कन्धों पर होना चाहिए ? साधारण जवाब होगा मस्तिष्क अर्थात बुद्धिजीवी वर्ग ! लेकिन क्या आज भारत में ऐसा हो रहा है ? बहुत पुरानी  कहावत है और आम प्रचलित भी कि " प्रजातंत्र मूर्खों का शासन होता है " अंग्रेजी भाषा में कहें तो  "democracy  is the government of fools " . अंग्रेजी के इस फूल् शब्द का अर्थ विदूषक अर्थात जोकर और मूर्ख दोनों ही होता है, तो क्या आज भारत का लोकतंत्र विदूषकों और मूर्खों द्वारा शासित और संचालित नहीं हो रहा है ? मुट्ठी भर लोगों का देश अमेरिका आज यदि सारी दुनिया का बेताज बादशाह बना बैठा है तो उसकी वजह यह है कि वहाँ की व्यवस्था में देश की आतंरिक और वैदेशिक नीतियों तक का संचालन करने के लिए राष्ट्रपति विभिन्न क्षेत्रों और विषयों के पारंगत विद्वानों को अपने मंत्रिमंडल के लिए चयनित करता है। वहाँ राष्ट्रपति के समक्ष ऐसी कोई बाध्यता नहीं है कि वह जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों , सीनेटरों को मंत्रिमंडल में स्थान दे।
     अमेरिका में राजनैतिक विरोधी को शत्रु भी नहीं माना जाता और इसका इससे बड़ा कोई दूसरा सबूत हो भी नहीं सकता कि जिन हिलेरी क्लिंटन ने अमेरिका के वर्त्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा के खिलाफ राष्ट्रपति का चुनाव लड़ा था , उन्हें ही ओबामा ने राष्ट्रपति बनाने के बाद उनके विदेश संबंधी ज्ञान को देखते हुए विदेश मंत्रालय जैसी सर्वाधिक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी। भारत में सब कुछ उलटा- पुल्टा है। यहाँ कृषि मंत्रालय उसे सौंप दिया जाता है जिसने शायद ही कभी खेत की मेड पर पाँव रखा हो। ग्रामीण विकास उसे सौंप दिया जाता है जिसने गाँव देखा ही नहीं और योजना आयोग उस व्यक्ति के हवाले कर दिया जाता है जो भारत को ही सही तरीके से नहीं जानता। रक्षा मंत्रालय संभालनेवाला खुद के चलने में दूसरों की मदद चाहता  है।क्या यह मज़ाक नहीं है और क्या आज देश के सामने जो समस्याएं हैं, उनकी सबसे बड़ी वजह भी यही नहीं है ?
     भारतीय लोकतंत्र का वर्त्तमान सच यह है कि अब देश में राजनैतिक विचारधाराओं और उनके प्रति प्रतिबद्धता का पूरी तरह लोप हो चुका है। उसकी जगह पूंजीवाद, अवसरवाद और माफियावाद स्थापित हो चुका है। अवसरवादी राजनेता हमेशा तिकड़म के खेल खेला करते हैं और बहुत बार तो यह खेल सत्तातंत्र द्वारा भी खेला जाता है। प्रायः देखने में आया है कि जब सरकारों की नीतियों के खिलाफ जनाक्रोश मुखर होने लगता है तो नए विवाद, नए मसाले जन्म लेने लगते हैं और वे मसाले ऐसे होते हैं कि सारे देश का ध्यान उनमें उलझकर रह जाता है। प्रायः ऐसे विवाद और मसले सत्तातंत्र द्वारा प्रायोजित होते हैं।
      मुंबई में बलवाइयों द्वारा महिला पुलिसकर्मियों के साथ अभद्रता की गयी, पुलिसवालों के हाथों से रायफलें तक छीन ली गयीं और पुलिस ने सख्ती नहीं दिखाई। खबर है कि ऊपर से निर्देश थे कि उपद्रवियों के साथ सख्ती न की जाय। अलविदा की नमाज़ के दिन अर्थात 17 अगस्त को नमाज़ के बाद लखनऊ में लाठी- डंडों से लैस उपद्रवी तोड़- फोड़ कर रहे थे और पुलिस अधिकारियों को ऊपर से निर्देश दिए जा रहे थे कि उपद्रवियों के साथ सख्ती न की जाए। इसका सीधा सा अर्थ है कि शायद इस उपद्रव की जानकारी शासन और प्रशासन को पहले से ही थी। शायद यह सब प्रायोजित था ,शायद इसका आशय एक नया विवाद पैदा कर जनाक्रोश की दिशा को बदलना रहा हो। संभव यह भी है कि यह प्रायोजन उनके द्वारा किया गया हो जो सरकार को बदनाम कर अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेकना चाहते हों। जो अपने राजनैतिक भविष्य के रास्ते तलाश रहे हों और सरकार ने बलवाइयों पर सख्ती न करने की हिदायत इसलिए दी कि विवाद को और अधिक बढ़ने से रोका जा सके। उपरोक्त दोनों बातों में से कम से कम एक बात तो सच जरूर है और सच यह भी है कि इस अमन के खिलाफ साजिश में कोई विदेशी हाथ हो या न हो लेकिन सियासत के हाथ ज़रूर शामिल रहे हैं।
       प्रश्न यह है कि जो कुछ भी हुआ उसमें जान बूझकर मीडिया को ही निशाना क्यों बनाया गया ? आखिर मुसलमानों को मीडिया से क्या शिकायत थी कि वे उनके कैमरे तोड़ने और उनके साथ मारपीट करने लगे ? एक ज़वाब तो यह हो सकता है कि मीडिया द्वारा समाचारों में आम मुसलमान की पीड़ा को यथोचित स्थान न दिए जाने के खिलाफ यह आक्रोश था। यह ज़वाब सम्पूर्ण नहीं है क्योंकि इससे पहले आम मुसलमानों की और से कोई ऐसी बात नहीं उठायी गयी थी कि मीडिया आम मुसलमानों की परेशानियों को कोई अहमियत नहीं दे रहा है। फिर सवाल उठाता है कि क्या मुसलमानों का साजिश के तहत इश्तेमाल किया गया और उन्हें जानबूझकर मीडिया के खिलाफ उकसाया गया ? सच यह भी हो सकता है , हाँ बलवाइयों को जितना करने के निर्देश थे , शायद उनमें युवाओं की अधिकता और उनमें भी अति उत्साह में कुछ ज्यादा ही उत्पात हो गया जिनमें महात्मा बुद्ध और जैन तीर्थंकर महावीर स्वामी की प्रतिमाओं को क्षतिग्रस्त किया जाना भी शामिल है।
       हमेशा बलवों, विवादों तथा उग्र गतिविधियों में मुसलमानों का वह तबका ही आगे नज़र आता है जो कम पढ़ा- लिखा है अथवा जिसका दायरा केवल दीनी तालीम तक ही सीमित है। निश्चित है कि नफ़रत के सौदागर ऐसे लोगों की धार्मिक भावनाओं को भड़काकर उनका अपने निजी स्वार्थों के लिए उपयोग करते हैं। ऐसे मुसलमानों और फिर उनकी भावी पीढी को भी दुनियावी तालीम से दूर रखने की साजिश सियासत और मुस्लिम समुदाय के ही कुछ बड़े मौलानाओं द्वारा आज़ादी के बाद से ही की जाती रही है , और वह साजिश आज भी हो रही है। सियासी ज़मातें मुसलमानों को हमेशा वोट बैंक बनाए रखना चाहती हैं और यह तभी तक संभव है जब तक मुसलमानों में शिक्षा का अभाव कायम रहेगा और वे अपनी रोजी- रोटी की समस्याओं से जूझते रहेंगे।
       मुस्लिम समाज को बेहतरी के रास्ते पर लाने , उनमें विवेक की ताकत पैदा करने , उन्हें भारतीय लोकतंत्र का वास्तविक हिस्सेदार बनाने के लिए ज़रूरी है कि उन्हें शिक्षित किया जाए , उनके लिए दीनी ही नहीं दुनियावी तालीम के रास्ते आसान किये जाएँ। यह उम्मीद सरकारों से नहीं की जा सकती क्योंकि वे सियासत की नीतियों से चलती हैं। यह उम्मीद मौलानाओं से भी नहीं की जा सकती क्योंकि तब उनकी इमामत और उनकी अपनी ही रोजी- रोटी के लिए खतरा पैदा हो जाएगा। यह ज़िम्मेदारी मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवी तबके को उठानी होगी, और साथ ही लोकतंत्र में घुस बैठे चोरों के खिलाफ देश के सभी बुद्धिजीवियों को जनजागरण की अलख जगानी होगी , तभी सुरक्षित रह सकेगा लोकतंत्र, देश की सामाजिक समरसता और हमारा अपना देश भारत।
                              - एस . एन . शुक्ल