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Wednesday, 16 October 2013

हवा में तीसरा मोर्चा



                                                    हवा में तीसरा मोर्चा

     हर आम चुनाव से पहले तीसरे मोर्चे का राग अवश्य सुनायी देता है लेकिन यह मोर्चा मूर्तरूप लेता हुआ अभी तक तो देखा नहीं गया .इस बार सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने के फिर दावे कर रहे हैं.दरअसल २०१२ के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अप्रत्याशित सफलता से उत्साहित समाजवादी पार्टी ने लक्ष्य २०१४ का नारा बुलंद करते हुए लोकसभा चुनाव में केंद्र में सत्तासीन होने की परिकल्पना की थी. मुलायम उसी परिकल्पना को मूर्तरूप देने के लिए व्यग्र हैं.सवाल यह है कि यदि तीसरा मोर्चा गठित करने की कवायद होती भी है तो मोर्चे के साथ आयेंगे कौन-कौन दल और मोर्चे की अगुवाई कौन करेगा ?फिलहाल संभावित तीसरे मोर्चे के मुलायम सिंह यादव स्वयंभू नेता हैं और इस मोर्चा बनाने की छटपटाहट  के पीछे उनकी खुद की महत्वाकांक्षा है .
         वर्ष १९९६ में तीसरे मोर्चे का राग बड़े तेज स्वर में बजा था और उस राग को बजानेवाले थे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के तत्कालीन महासचिव हरिकिशन सिंह सुरजीत .सबको पता है कि वामपंथियों को भाजपा और हिंदुत्व से सदैव एलर्जी रही है .वर्ष १९९० में अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलवाकर सपा मुखिया मुलायम सिंह "मुल्ला मुलायम "का खिताब पा चुके थे तो स्वाभाविक तौर पर वामपंथियों से उनकी निकटता भी बढ़ गयी थी. कांग्रेस को सत्ता से उखाड़ फेकने,धर्मनिरपेक्ष सरकार बनाने और साम्प्रदायिकता की प्रतीक भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के नाम पर तब हरिकिशन सिंह सुरजीत ने तीसरे मोर्चे की मुहीम को हवा दी थी तो मुलायम सिंह यादव के सिर पर वरदहस्त रख उन्हें प्रधानमंत्री पद के सपने भी दिखाए .
      तब्ब लोकसभा में तीसरा मोर्चा बड़ी ताकत के रूप में उभरकर आया भी था, लेकिन सुरजीत की पुरजोर पैरवी के बावजूद मुलायम सिंह यादव को प्रधानमंत्री बनाए जाने पर सहमति न बन सकी. उस समय मोर्चे में सबसे बड़ा घटक जनता दल था जो उस पीड़ा को भुला नहीं पा रहा था जब १९९१ में मुलायम सिंह ने जनता दल तोड़कर पहले चंद्रशेखर की अगुवाई में सजपा का दामन थामा और फिर चाँद दिनों बाद ही अपनी अलग समाजवादी पार्टी बना डाली .अर्थात जनता दल द्वारा आपत्ति के कारण ही तब मुलायम सिंह प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए थे, लेकिन वह टीस आज भी उनके मन में है और वह किसी भी तरह एक बार भारत के प्रधानमंत्री पद तक पहुँचने का सपना पूरा करना चाहते हैं .
        वामदलों के बीच स्थापित अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि के कारण उसके बाद भी मुलायम स्वीकार्य बने रहे तो उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य से बड़ी ताकत के साथ वह लोकसभा में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे .वर्ष २००८ में जब भारत-अमेरिकी परमाणु करार का विरोध करते हुए वामदलों ने यूपीए-1 सरकार से समर्थन वापस लिया था तो उन्हें मुलायम से भी सरकार के विरोध की उम्मीद थी,लेकिन मुलायम तब सरकार के साथ खड़े नज़र आये. अभी बहुत दिन नहीं हुए जब एफडीआई मुद्दे पर मुलायम सिंह ने जो दांव खेला था उससे उन पर सर्वाधिक भरोसा करनेवाले वामदलों को भी गहरा आघात लगा था.जब वामदल एफडीआई के विरोध में वोटिंग पर मुलायम का सहयोग चाहते थे , उस समय उन्होंने संसद से बहिर्गमन कर परोक्ष रूप में सरकार की मदद ही की .
     राष्ट्रपति चुनाव के समय ममता बनर्जी को भड़काने वाले और फिर अचानक पाला बदल लेने वाले मुलायम सिंह ही थे. जयललिता राजग की ओर फिर से दोस्ती का हाथ बढ़ा चुकी हैं .चंद्रबाबू नायडू को भी भाजपा के साथ जाने में ही अपना हित लग रहा है.बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद को मुलायम से बड़ा नेता मानते हैं तो वह क्यों तैयार होंगे मुलायम का नेतृत्व स्वीकार करने को ? यूं भी इस समय उनकी कांग्रेस से गहरी छन रही है. अकाली दल पंजाब में भाजपा के साथ सत्ता का सुख भोग रहा है. हरियाणा में इनेलो को वर्त्तमान परिस्थिति में भाजपा ही सबसे बड़ी मददगार नज़र आ रही है तो उत्तर प्रदेश में रालोद अब किसी भी कीमत पर सपा से हाथ मिलाने को तैयार नहीं है.
          जहां तक वामदलों का सवाल है तो वे बंगाल में ही अभी अपनी बिगड़ी सेहत संभाल पाने की स्थिति में नहीं हैं.बिहार में कभी वे ताकतवर थे भी तो अब गुटों में बट जाने के कारण वे खुद ही पस्त नज़र आ रहे हैं.लालू प्रसाद यादव भले ही इन दिनों जेल में हैं लेकिन उनकी पार्टी राजद,  मुलायम को कभी भी नेता स्वीकार करने को तैयार नहीं होगी.द्रमुक इस समय कांग्रेस के साथ है और हाल-फिलहाल वह अलग भी नहीं होगी. कर्नाटक में देवगौड़ा को किसी सहयोगी की दरकार तो है किन्तु सपा की वहां कोई ताकत नहीं है तो देवगौड़ा किसी अन्य राज्य में किसी दूसरे  की मदद कर पाने की स्थिति में नहीं हैं.
      सवाल यह है कि यदि फिर भी सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव तीसरा मोर्चा बनाना ही चाहते हैं तो उस मोर्चे में शामिल होने वाले दल भी वही होंगे जो शायद ही एक या दो सांसदों के साथ लोकसभा पहुँच सकें और सदन में दलों की सूची में अपने नाम को दर्ज करा सकें.
    मुलायम अखाड़े के पहलवान रहे हैं लेकिन अपने राजनैतिक जीवन में अपने सहयोगी दलों को भी पटखनी देने में अखाड़े के दांव आजमाते रहे हैं. उत्तर प्रदेश में जब मुलायम सरकार जनता दल और कांग्रेस के सहयोग से चल रही थी तब जनता दल के ३२ में से २८ को तोड़कर अपनी पार्टी में शामिल करनेवाले और जनता दल की जड़ों में मट्ठा डालने वाले भी मुलायम सिंह ही थे.बसपा के साथ उन्होंने जो किया वह इतिहास का काला अध्याय ही कहा जाएगा तो रियायत उन्होंने अपने सियासी गुरू चौधरी चरण सिंह और वरिष्ट राजनेताओं हेमवती नन्दन बहुगुणा, वी.पी.सिंह और चंद्रशेखर के साथ भी नहीं की.
        यही वजह है कि मुलायम सिंह की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाने वाले भी उनसे सतर्कता और शंका के साथ ही हाथ मिलाते हैं. वर्त्तमान राजनैतिक परिस्थितियों में न तो सपा प्रमुख से हाथ मिलाने के लिए कोई सशक्त सहयोगी नज़र आ रहा है और न ही भाजपा या कांग्रेस नीत गठबंधनों के अतिरिक्त किसी मजबूत महाज के बनने की संभावनाएं ही दिखाई दे रही हैं. फिर भी यदि मुलायम सिंह यादव तीसरे मोर्चे का राग अलाप रहे हैं, तो यह तो वही बता सकते हैं कि आखिर कैसे बनेगा उनके सपनों का तीसरा मोर्चा .
                                                           
                                                                                           -एस.एन.शुक्ल  

           

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